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14 June, 2010

हम सब जीते हैं

सफ़ेदी की चमकार
ये अंदर की बात है
टेस्ट आफ़ इंडिया
कुछ मीठा हो जाए
हटके झटके
टेढे हैं पर मेढे हैं
भूख लगे तो बस...
क्या करें मानते ही नहीं बच्चे

कितने ही शैंपू काम लिए
बालों को लम्बे काले घने रखने के लिए
फ़िर कोई नया शैंपू आ धमकता है
एक नयी खासियत के साथ

कितने फ़ेसवाश काम लिए
चेहरे को खूबसूरत और हसीन बनाने के लिए
फ़िर कोई फ़ेसवाश आ धमकता है
एक नयी खासियत के साथ

कितनी साबुनें आजमायी
देह की ताज़गी के लिए
फ़िर कोई नई साबुन आ जाती है
ललचाने के लिए

कितने शक्तिवर्धक प्राश, कैप्सूल लिए
योग व्यायाम किए
इस काया को चुस्त दुरस्त दीर्घायु रखने के लिए
फ़िर कोई नया नुस्खा आ जाता है
भरमाने के लिए

खाने पीने, जगने सोने से लेकर
जीवन का हर क्रिया कलाप
संचालित है विग्यापनों के हाथों

केवल बच्चे ही नहीं
हम सब जीते हैं
विघ्यापित जीवन

1 comment:

  1. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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