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01 May, 2011

गज़ल जैसा कुछ - १

गिर जाने का उनको, लगता हमेशा डर
रखते हैं हर कदम, सोच समझ कर

हम भले, तुम भले, भला हमारा घर
दुनियां जाए भाड़ में, करें क्यूं फ़िकर

जितना मिले, जहां मिले, चूकना नहीं
सबकी पोल खोलें, खुद की छिपा कर

सड़कों पर उतरे मूरख, हाथों में ले मशालें
उनके घर जला के, चमकाते अपना घर

औरों के कांधे हरदम, लड़े अपनी लड़ाई
जीतें हरेक बाजी, शकुनि सा खेल कर

घर, गली चरते चरते, चर गए पूरा देश
फ़िर भी भरे न पेट, हाकिम हमारे जबर

ये पलें फ़ूलें फ़लें इनकी बला से देश जले
कैसी भी हो कहर , इन पर है बेअसर

3 comments:

  1. वाह नवनीत भाई... हर शेर वजनदार....शानदार रचना है...

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