मैं कब कहता हूं,मेरा लिखा कविता है, गज़ल है
लिखने की है हूंस, लिखना मेरा शगल है
मैंने कब कहा, पढना मुझे तुम
फ़िर भी तुमने पढा, मेरा लिखना सफ़ल है
प्रेम है पड़ोसियों से पर रहे अपने घर में
क्यूं तकें पड़ोसियों को, हमारा घर भी तो महल है
आती ही नहीं कलमबंदी, न ही बंधा किसी बाड़े में
अनुभूत बीज बोया कलम हल ने, वही मेरे खेत की फ़सल है
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16 April, 2011
14 April, 2011
गज़ल के बहाने-४
कितनी भली हैं ये खामोशियां
बातें करती है उदासियां
जब भूला दिया याद करनेवालों ने
क्यूं आती है हिचकियां
आंखें रोना चाहती है धाड़ धाड़
रोने ही नहीं देती सिसकियां
जब पैदा करनी होती है दूरियां
गिनाने लगते हैं मजबुरियां
कहां से आएगी रोशनी, ताजी हवा
जब खोलेंगे ही नहीं खिड़कियां
जब तक बंधी है पाल किनारे से
पार कैसे पहुंचेगी कश्तियां
बातें करती है उदासियां
जब भूला दिया याद करनेवालों ने
क्यूं आती है हिचकियां
आंखें रोना चाहती है धाड़ धाड़
रोने ही नहीं देती सिसकियां
जब पैदा करनी होती है दूरियां
गिनाने लगते हैं मजबुरियां
कहां से आएगी रोशनी, ताजी हवा
जब खोलेंगे ही नहीं खिड़कियां
जब तक बंधी है पाल किनारे से
पार कैसे पहुंचेगी कश्तियां
09 April, 2011
गज़ल के बहाने-३
पहचानते हैं चोरों को पकड़ नहीं सकते
मजबूरी है राजा को नंगा, कह नहीं सकते
जानते हैं जगह जगह से, टपकती है छत
रेत की सीमेण्ट से, गढ्ढे भर नहीं सकते
नीम हकीमों के हाथों में, नब्ज़ इस वक्त की
इनके दिए जहर, दवा बन नहीं सकते
भौंकनेवालों को मिल जाते हैं टुकड़े
पालतू हो जाते हैं, फ़िर भौंक नहीं सकते
चोरों को पकड़नेवाले ही जब चोर हैं
चोरों के घर चोर, चोरी कर नहीं सकते
बैसाखियों पर राज, बैसाखियों पर देश
बिन बैसाखी चंद कदम, चल नहीं सकते
हर उम्मीद बेमानी हर मंजिल है दूर
अपने ही फ़न, हम कुचल नहीं सकते
मजबूरी है राजा को नंगा, कह नहीं सकते
जानते हैं जगह जगह से, टपकती है छत
रेत की सीमेण्ट से, गढ्ढे भर नहीं सकते
नीम हकीमों के हाथों में, नब्ज़ इस वक्त की
इनके दिए जहर, दवा बन नहीं सकते
भौंकनेवालों को मिल जाते हैं टुकड़े
पालतू हो जाते हैं, फ़िर भौंक नहीं सकते
चोरों को पकड़नेवाले ही जब चोर हैं
चोरों के घर चोर, चोरी कर नहीं सकते
बैसाखियों पर राज, बैसाखियों पर देश
बिन बैसाखी चंद कदम, चल नहीं सकते
हर उम्मीद बेमानी हर मंजिल है दूर
अपने ही फ़न, हम कुचल नहीं सकते
08 April, 2011
मुखौटे लगाना भूल गए
याद करते करते
कई चीजें नहीं रहती याद
कितना भी खपाएं दिमाग
आती ही नहीं याद
किसी को कुछ
बताना भूल गए
किसी से कुछ
पूछना भूल गए
औरों को कहते रहे
सावधान!
ध्यान रखना!
बचना!
खुद ही लेकिन
खुद को
बचाना भूल गए
भूल कर भी जहां
कहने नहीं
छिपाने थे सच
चेहरे पर यारों!
मुखौटे लगाना भूल गए
कई चीजें नहीं रहती याद
कितना भी खपाएं दिमाग
आती ही नहीं याद
किसी को कुछ
बताना भूल गए
किसी से कुछ
पूछना भूल गए
औरों को कहते रहे
सावधान!
ध्यान रखना!
बचना!
खुद ही लेकिन
खुद को
बचाना भूल गए
भूल कर भी जहां
कहने नहीं
छिपाने थे सच
चेहरे पर यारों!
मुखौटे लगाना भूल गए
05 April, 2011
गज़ल के बहाने-२
एक
उल्टे सीधे नम्बर बोलता है
जुआरी लगता है
मजमा लगाए बैठा है
मदारी लगता है
सबको सलाम ठोकता है
दरबारी लगता है
ईश्वर को गाली देता है
भिखारी लगता है
दो
अपना ही चेहरा भूल जाता है
नित नए आईने आजमाता है
हरेक पर अंगुली उठाता है
बाकी किधर है, भूल जाता है
होश की बात करे भी तो कैसे
बस थोड़ी में ही बहक जाता है
कैसी फ़ितरत बना ली है अपनी
देखने, सुननेवालों को तरस आता है
उल्टे सीधे नम्बर बोलता है
जुआरी लगता है
मजमा लगाए बैठा है
मदारी लगता है
सबको सलाम ठोकता है
दरबारी लगता है
ईश्वर को गाली देता है
भिखारी लगता है
दो
अपना ही चेहरा भूल जाता है
नित नए आईने आजमाता है
हरेक पर अंगुली उठाता है
बाकी किधर है, भूल जाता है
होश की बात करे भी तो कैसे
बस थोड़ी में ही बहक जाता है
कैसी फ़ितरत बना ली है अपनी
देखने, सुननेवालों को तरस आता है
03 April, 2011
इस बार जब देखो
इस बार जब देखो
बूंदों को बरसते हुए
सुनना!
बूंद बूंद एक गाना है
इस बार जब देखो
पंछियों को उड़ते हुए
देखना!
आसमान तुम्हारा है
इस बार जब देखो
किसी चिड़िया को
कबूतरों के पालसिये में नहाते हुए
चुपचाप नहाने देना!
यह अद्भुत अविस्मरणीय नजारा है
इस बार जब देखो
दिन को रात की आगोश में जाते हुए
याद रखना!
जाते को आते का सहारा है
इस बार जब देखो
कोई शव जाते हुए
मत भूलना!
यह भी एक इशारा है
बूंदों को बरसते हुए
सुनना!
बूंद बूंद एक गाना है
इस बार जब देखो
पंछियों को उड़ते हुए
देखना!
आसमान तुम्हारा है
इस बार जब देखो
किसी चिड़िया को
कबूतरों के पालसिये में नहाते हुए
चुपचाप नहाने देना!
यह अद्भुत अविस्मरणीय नजारा है
इस बार जब देखो
दिन को रात की आगोश में जाते हुए
याद रखना!
जाते को आते का सहारा है
इस बार जब देखो
कोई शव जाते हुए
मत भूलना!
यह भी एक इशारा है
01 April, 2011
घर - दो कविताएं
घर-१
पहले था
एक खुला द्वार
सबके लिए
द्वार के पार
घर की बैठक
बैठक के पार
आंगन
आंगन के पार
भरा पूरा घर
अब-
एक कालबेल है
एक दरवाजा
दरवाजे के पार
ड्राईंग रूम
ड्राईंग रूम में
कई तरह की पेंटिंग्स
फ़िर लॉबी
जिसमें होती है
लॉबिंग
घर के खिलाफ़
घर-२
जहां खड़े हो
वह फ़र्श नहीं छत है
नीचे वाले की
जिसे तुम छत समझ रहे हो
वह फ़र्श है ऊपर वाले का
हंसने की बात नहीं है
यह महानगर है
यहां जो दिखता है
वह होता नहीं
जो होता है
दिखता नहीं
पहले था
एक खुला द्वार
सबके लिए
द्वार के पार
घर की बैठक
बैठक के पार
आंगन
आंगन के पार
भरा पूरा घर
अब-
एक कालबेल है
एक दरवाजा
दरवाजे के पार
ड्राईंग रूम
ड्राईंग रूम में
कई तरह की पेंटिंग्स
फ़िर लॉबी
जिसमें होती है
लॉबिंग
घर के खिलाफ़
घर-२
जहां खड़े हो
वह फ़र्श नहीं छत है
नीचे वाले की
जिसे तुम छत समझ रहे हो
वह फ़र्श है ऊपर वाले का
हंसने की बात नहीं है
यह महानगर है
यहां जो दिखता है
वह होता नहीं
जो होता है
दिखता नहीं
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