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29 May, 2015

भले घर की लड़कियां - नवनीत पाण्डे

भले घर की लड़कियां 

 

बहुत भली होती हैं

यह बात अलग है

भले घर की लड़कियां

नहीं जानतीं

भला क्या होता है

सिवाय इसके कि

जो घरवालों द्वारा

उनके दिमाग में

ठोंक_ ठोंक

बैठा दिया जाता है

तरह- तरह से

सिखा, पढ़ा

समझा दिया जाता है

अनचाहा कराया जाता है

उसी को भला कहा जाता है 

 

भले घर की लड़कियों के मुंह में

ज़ुबान नहीं होती

होती भी हैं तो

उन्हें रोक- टोक

दिया जाता है

बिना पूछे

कुछ भी बोलना

कहना मना होता है

 

भले घर की लड़कियों  के

सिर्फ कान होते हैं

उन्हें सिर्फ कहा हुआ

सुनना, गुनना और

करना होता है

भले घर की

लड़कियों की

न हंसी

गालों पर दिखती है

न आंसू

हंसना- रोना

दोनों ही

बेआवाज़

चुपचाप होता है 


भले घर कीलड़कियों की आंखों

और ज़ुबान पर

पहला हाथ

उनकी मांओं का ही होता है

भले घर की लड़कियों को

उनकी मांए

अपनी ही तरह

उन्हें सबसे पहले उठने

और सबके बाद

सोने की घुटी पिला देती है 


भले घर की लड़कियों के घर

घर नहीं

धर्म, नैतिकता,

आदर्शों युक्त

स्नेह, प्रेम भरे

आदेशों, कानूनों की

खाप होते हैं 


भले घर की लड़कियों के घरों में

भले घर की लड़कियों के लिए

सिर्फ दूर दर्शन होता है

उन्हें केवल

धार्मिक स्थलों, मेलों

भजन, कीर्तन, कथाओं में ही

जाने की अनुमति होती है

वह भी परिवार-जनों के साथ

उन्हें हर खबर से

बेखबर रखा जाता है

मोबाइल तो बहुत बड़ी बात है

वें घर में रखे टेलीफोन की

घंटी भी नहीं सुन सकतीं 


भले घर की लड़कियां

झाड़ू- मसौदे

चौका- बासन

कपड़े-लत्ते

धोने से लेकर

सीने- पिरोने

कढ़ाई- बुनाई

गृहिणी के

हर काम में

पारंगत होती हैं

 

भले घर की लड़कियों की पढ़ाई

घर में ही या

उतनी ही होती है

जितनी में वें

भली रह सकें

 

भले घर की लड़कियां

अपने नहीं

अपने परिवार

समाज की

सोच से जीती है

उन्हीं के इशारे

चलती- फिरती

उठती- बैठती

ओढ़ती- पहनती

जीती-मरती हैं

 

भले घर की लड़कियों के

घर में अलग से

कमरे नहीं होते

होते भी हैं तो

उनकी खिड़कियां

चौकस बंद होती हैं

और उन पर

मोटे- मोटे पर्दे भी

 

भले घर की लड़कियां

हमेशा निगरानी में रहती हैं

अकेली

कहीं नहीं आती- जाती

भेजीं जाती

भले घर की लड़कियां

घर से बाहर

सिर्फ घर के काम  से

आती- जाती हैं

अपने काम से

जाने के लिए

सबको बताना पड़ता है

क्या काम है

कितनी देर लगेगी

साथ में कौन जा रहा है 


भले घर की लड़कियों की

बहुत कम सहेलियां होती हैं

वे भी गली-मुहल्ले

रिश्तेदारी की

लड़कों के तो

पास भी नहीं फटकने दिया जाता

 

भले घर की लड़कियां

अपने मन का कुछ नहीं करती

अपने वर्तमान-भविष्य

यहां तक कि

जीवन- साथी का चयन

जीवन के इससे भी बड़े

अहम फैसले भी

घर- परिवार पर

छोड़ देती हैं

 

भले घर की लड़कियां

लड़कियां नहीं

खूंटें बंधी गाएं हैं

जिन्हें बहुत प्रेम, डर से

एक उम्र तक

उनके पालक दुहते हैं

और अनचाही उम्र में

जननी-जनकों द्वारा

अक्ल निकाल, बुध्दु बना

साज- श्रृंगार कर

गुड़िया बना 

गाजे- बाजे के साथ

अग्नि को साक्षी मान

सात चक्कर कटा

डोली में बैठा

उन अनजान

नितांत अपरिचित

गुड्डों के साथ

(जो हकीकतन अधिकतर भले गुंडे होते हैं)

चलती कर दी जाती हैं

 

इस तरह

भले घर की लड़कियां

एक कारा

एक नरक से निकल

दूसरी कारा

दूसरे नरक में पहुंच जाती है

और इस तरह

भले घर की लड़कियां

सौभाग्यवती कहलाती हैं

जन्म से मृत्यु तक

वरदान के रूप

अपने भले होने की

सज़ा पाती हैं

 

भले घर की लड़कियां

इतनी भली होती हैं

कि आखिर में

जब थक- हार जाती हैं

असहनीय हो जाता है

बोझ भलेपन का

कानोकान खबर नहीं होती

झूल जाती हैं फंदों से

खा लेती हैं ज़हर

खतम कर लेती हैं

अपनी इह लीला

 

भले घर की लड़कियां

जब लेती हैं लोह

करती हैं विद्रोह

भलेपन के खिलाफ

पत्थरों से

सिर फोड़ने की बजाय

भाग जाती हैं

भलेपन की काराएं तोड़

वें नहीं रहतीं भली

ठहरा दी जाती हैं

पापिन, कुलच्छनी

घर -परिवार

धर्म- समाज

कोसता है उन्हें

उनके जन्म को

"काहे की भली

बदनाम कर दिया

नाक कटा दिया

बड़ी बेहया

नालायक निकली"

*******

-नवनीत पाण्डे

 

07 June, 2014

देख! नागार्जुन बाबा व अन्य कविताएं



बीस रुपए प्रति लीटर 


गंगा! आजकल
हिमालय,
हरिद्वार,
इलाहाबाद,
बनारस में नहीं
प्लेटफार्म,
बस स्टैंड,
बाजार की
बंद बोतल में है
बीस रुपए प्रति लीटर
+++++++

अपने समय के ऊंट
(दल- बदलुओं से क्षमा सहित) 

अपने समय के
ऊंट हैं वे
जगह- मौके देख!
करवट बदल लेते हैं
+++++++

फिर काम आने के लिए 

हम सिर्फ़ औज़ार भर हैं
तुम्हारे हाथों के
जिन्हें तुम अपने मतलब,
समय- असमय
तेल, धार दे
रंवा करते रहते हो
जैसे, जहां काम लोगे तुम
काम आएंगे हम
हम तो हैं ही
बस, काम आने के लिए
जैसे ही पूरे होंगे
तुम्हारे मंसूबे
रख दिए जाएंगे संभाल कर
फिर उसी टूलबॉक्स में
फिर काम आने के लिए
+++++++

देख! नागार्जुन बाबा

देख! नागार्जुन बाबा
कांव कांव कर कागा
मार चोंच फ़िर भागा
बिन छेदों की सुइयां
क्या करेगा धागा
नागा रहेगा नागा
बेसुरे इक्कठ्ठे सारे
बाजे डफ़ली बाजा
गाते राग अरागा
चोर मौसेरे डाले
लोकतंत्र घर डाका
जनपथ ठगा अभागा
+++++++

ये सड़कें थोड़े ही हैं

इन सड़कों का कोई इतिहास नहीं है
ये अचानक ही प्रकट हुयी हैं
जिन पर
धकियाया जा रहा है हमें
छूने को वे सपनीली
रोशनियों भरी मीनारें
जो अपने भीतर
न जाने कितने अदेखे
अंधेरे समेटे हैं
और कोई रास्ता,
चारा नहीं है
हमें इन्हीं पर चलना होगा
भले ही यात्राएं
न हों निरापद
इनके टोल भरना होगा
इन अंधेरों को ढोना ही है
जानते हुए कि देर- सवेर
ये सड़कें टूट ही जानी हैं
ये सड़कें थोड़े ही हैं
योजनाकारों-निर्माताओं,
उद्घाटनकर्ताओं के बीच हुयी
दुरभिसंधियों की
अदेखी-अलेखी कहानी है
+++++++

अब! सिर्फ़

होते ही सूर्यास्त
वे चांद निकल पड़े
अपने- अपने राज- प्रासादों से
राजहंसों पर सवार हों
शिकार पर
धीरे- धीरे, बेआवाज़
और जुट गए
चुपचाप!
अंधेरों की आगोश में
फ़ैली बस्तियों में
टिमटिमाती लालटेनों, दीयों
मोमबत्तियों की बातियों
रोटियां सेंक रहे
चूल्हों के सीनो में
धधक रही आग को
एक -एक कर बुझाने में
तब तक,
जब तक....
धरती पर पसरी
अंधेरी रातों का
दिपदिपाता
वह आसमान
पूर्णत:
सितारों विहीन
घुप्प अंधेरो में डूब
बियाबान नहीं हो गया
अब! सिर्फ़
न खतम होनेवाली
रात बची है
अपने घुप्प अंधेरों में
रुदन करती हुयी
या
उन चांदों की चमचमाती आंखे
अपने राज- प्रासादों की
रोशनियों में
लालटेनों, दीयों,
मोमबत्तियों
और चुल्हों की बुझी आग
अपनी आंखों में भरती हुयीं
+++++++

12 January, 2014

गज़ल जैसा कुछ - फूल मत तोड़ो खुश्बू कहती हैं

गज़ल जैसा कुछ


फूल मत तोड़ो खुश्बू कहती हैं

जान इन में ही मेरी बसती है
फूल मत तोड़ो खुश्बू कहती हैं

ये जो टूटा तो टूट जाऊंगी मैं
सुर को मत तोड़ो राग कहती है

जो नहीं आती कभी होठों पर
बातें हर दिल में ऐसी रहती है

है नहीं चाहत जिन्हें समंदर की
ऐसी नदियां भी इधर बहती है

आंख पढ लें न झूठ आंखों का
आंख से बच के आंख रहती है

वह तो फूला है फलों फूलों पर
पेड़ क्या जाने जड़ क्या सहती है

चंद महलों की रोशनी के लिए
जाने कितनों की बस्ती जलती है

है मुक्कमल कौन दुनियां में
कोई न कोई कमी तो रहती है

हम भी सूरज कि चांद हो जाएं
हर सितारे के दिल ये रहती है

गया कहां था बता तो जाता
घर में घुसते ही मां ये कहती है

जो जलाते हैं हवाओं में दीए
उनकी अंधेरों से ठनी रहती है
*****


वो उन्हें, वो उन्हें, पार लगाते रहे।


वो उन्हें, वो उन्हें, दम दिखाते रहे।
एक दूजे को यूं, आजमाते रहे।

था सबको पता, असल में कौन क्या?
नूरा कुश्ती सभी को, दिखाते रहे।

करते भी और क्या, नाव जो एक थी
वो उन्हें, वो उन्हें, पार लगाते रहे।

बोलती हुयी बंद, जब खुले राज ए यार
बंट खाते रहे, कसमसाते रहे।

पूछा! कामरेड, ये पोलिटिक्स है क्या?
बात घुमाते रहे, मुस्कराते रहे।
*****

चक्कर क्या है?

देख के भी,  अनदेखा करते थे जो 
आज रहे चल के पुकार, चक्कर क्या है?

दिया न उत्तर कभी सलाम का 
आज चल के खुद नमस्कार, चक्कर क्या है?

मूंह फुलाए ही दिखे हमेशा
आज जता रहे इतना प्यार, चक्कर क्या है?

रहे बोल में बारह आने
आज होंठ बहे रसधार, चक्कर क्या है?

कल तक हमें बताते कमतर
आज हमारी रहे बघार, चक्कर क्या है?

नहीं थी हमारी जिन्हें दरकार
आज मनुहारों पर मनुहार, चक्कर क्या है?


08 September, 2013

खिलाफ़ों के खिलाफ़

जैसी भी है अपनी खुश्बू

कभी नहीं मुरझाता
न ही सूखता
फ़ेंका जाता
कचरे मानिंद

खिला रहता
बिखेरता रहता
अपनी सीमाओं में
जैसी भी है अपनी खुश्बू

अगर तुमने
तोड़ा न होता!
*****

देखना! तुम!

भले ही छीन लो पतवार
छोड़ दो बीच मझधार
खिलाफ़ धार के
फ़िर भी हम 
होगें पार
देखना! 
तुम!
*****

खिलाफ़ के खिलाफ़

खिलाफ़ हवाओं के
कब रहा आसान 
भरना उड़ान
पाना आसमान

फ़िर भी उड़ता हूं
हवाओं के खिलाफ़
आसमान के खिलाफ़
और सारे 
खिलाफ़ों के खिलाफ़
*****

पता चला-

जिन्हें हमेशा मैंने 
अपने भीतर 
मिश्री सा सहेजे रखा 

पता चला-

उन्होंने मुझे 
अपने भीतर तो क्या
आस-पास, दूर-दूर भी 
नहीं देखा-रखा
*****

ठीक

सिर्फ़ तुम्हारे
और मेरे मानने से
ठीक नहीं होगा ठीक
ठीक तभी है ठीक
जब सभी मानें ठीक
*****

07 April, 2013

जैसे जिनके धनुष व कुछ अन्य कविताएं


मेरी कलम

मेरी कलम
मेरी थाती है
हर मोर्चे पर
केवल
और केवल
वही मुझे बचाती है
*****

कविता- १

शब्द नहीं है कविता
पर
शब्द से बाहर भी
कहां है कविता?
*****


कविता - २

कविता 
शब्द में नहीं 
उस पाठ- पाठी में होती हैं
जिन्हें कविता से लगते हैं शब्द!
एक शब्द में भी हो सकती है 
एक भरपूर, पूरी, 
मुक्कमल कविता
हो सकता है- 
सैंकड़ों कविताओं के संग्रह में
न हो एक भी कविता
*****


ढके-छिपे सच!

लुभाते हैं
ललचाते हैं 
कुछ शीर्षक
मुख पृष्ठ
अपनी तड़क-भड़क से
पर 
जब खुलने लगते हैं 
भीतर के 
पृष्ट दर पृष्ट
आ ही जाते हैं चौड़े
सारे ढके-छिपे सच!
*****



जैसे जिनके धनुष हैं

न तुम कम
न मैं कम
वह भी कम नहीं वीर
जैसे जिनके धनुष, 
वैसे उनके तीर
*****


09 January, 2013

तोड़ रहा हूं आज मैं सारे,सन्नाटे के छंद


गीत जैसा कुछ

तोड़ रहा हूं आज मैं सारे,सन्नाटे के छंद
आज खोल के ही मैं रहूंगा, सब दरवाजे बंद

बहुत घुट चुका अब न घुटूंगा, अंधेरी काराओं में
अब न कभी आरोपित हूंगा, तेरी इन धाराओं में
आज उड़ के ही  मैं  रहूंगा, अपने आकाश स्वच्छंद

हदें हो चुकी सारी बेहद, अब न गुलामी होगी
केवल अपनी राह चलूंगा, अब न नाकामी होगी
आज छंटेगें सारे कुहरे, मिट जाएंगे द्वंद

होगा हर रोधी का विरोध, रुदन नहीं अब होंगे गीत
बीत गई सो गई बीत, अब तो केवल, केवल जीत
जुड़े हाथ, हो रहे मुठ्ठियां, तोड़ के सारे बंद
 *****

25 September, 2012

दो कविताएं






मैं जो हूं

मैं
नदी नहीं
रास्ता हूं
जिससे होकर बहती है नदी

मैं
सागर नहीं
तल हूं
जिस पर टिक
लहराता, इतराता है सागर

मैं जो हूं
वह मैं हूं
जो मैं नहीं
होना भी नहीं चाहता वह!
*****

चाह

नहीं चाहता
सपने देखना, दिखाना
भरमना, भरमाना
कोई बहुत बड़ी चाह नहीं है ये
पर कभी पूरी ही नहीं होती
*****

14 April, 2012

दो कविताएं: नवनीत पाण्डे

जो कहीं नहीं है

ये ककहरे
शब्द
वाक्य
भाषा
पूरी किताब
कुछ भी तो नहीं मेरा
ये संज्ञा
सर्वनाम, विशेषण,
रिश्ते-नाते
भावनाएं-कामनाएं
जीवन-प्रपंचों का
पूरा व्याकरण
यहीं से ही तो मिला
इन सबसे इतर
जो भी है
मेरे भीतर-बाहर
मैं हूं
जो कहीं नहीं है
*****

मेरी आग

वे लगे हैं
हर तरफ़ से
हर तरह से
करने को राख
मेरी आग को
करता रहता हूं जतन
उसे ज्वाला बनाने का
यह जानते हुए कि
बहुत खिलाफ़ है मेरे
हवाओं के रुख
फ़िर भी हूं प्रतिबध्द
देती रहती है
भरोसा मुझे
मेरी आग
*****

24 March, 2012

तीन कविताएं

खारापन

जल
जब तक है
कुआं, बावड़ी, ताल-तलैया,
नदी, झरना
होता है-
मीठा, मृदुल, शीतल, निर्मल,
प्यास बुझानेवाला
समंदर होने पर ही
उगता, व्यापता है
खारापन उसमें
*****


ओर-और

उस ओर कुछ नहीं है
सिवा उस ओर के
इस ओर भी कुछ नहीं
सिवा इस ओर के
एक और,
ओर है
जो दोनों ही ओर है
इस ओर भी,
उस ओर भी...

बहुत से ओर
हैं उस ओर
एक भी ओर नहीं
इस ओर
मैं किस ओर
अपने ओर को देखूं!

औरों को देखते-देखते
और ही हो गया हूं मैं
सच कहूं!
इन औरों के जंगल में
औरों के साथ
कुछ और ही हो गया हूं मैं!
*****

कवि है कि नहीं

वे कवि नाम देख कर
करते हैं तय
कविता पढी जाए कि नहीं
मैं!
कविता पढकर तय करता हूं
कवि-कविता है कि नहीं
*****

02 March, 2012

स्त्री: दो कविताएं

देह तो मात्र स्थायी है

इतने बिम्ब
प्रतीक गढे तुमने
जाने क्या-क्या
कसीदे पढे तुमने
पर पढ न पाए
एक बार भी मन
लिख ही न पाए कभी मन
केवल देह तो नहीं थी मैं!
देह तो मात्र स्थायी है
उस गीत के अंतरे की
जिसे सुना तुमने देह से
और केवल स्थायी
नहीं हो सकता
एक मुक्कमल गीत
बिना अंतरे के
सुनो!!
स्थायी के साथ
अंतरा भी सुनो!
पूरा गीत सुनो!!
केवल...
केवल स्थायी नहीं!!
*****

यह नरक सा स्वर्ग कब चाहा था उसने

वह बोलती
पर किसी को सुनाई नहीं देता
वह रोती
किसी को दिखाई नहीं देता
उसकी हंसी
खतम हो गयी थी कुंवारेपन के साथ ही
कुछ भी तो नहीं था ऎसा
जिसे कह सके अपना
घर:एक सपना
जो कागज़ों में था उसके नाम
जिसमें सब थे सिवा उसके
जो सबका था
सिवा उसके
सुबह से शाम
सबके लिए खटते-खटते
सबके लिए लड़ते-लड़ते
फ़ुर्सत ही कब दी किसी ने
अपने लिए कुछ करने की,
लड़ने की
हमेशा ही रही
पीहर में बहन-बेटी
ससुराल में पत्नि-बहू
किसी ने भी नहीं महसूसा
उसकी शिराओं में बहता लहू
यह नरक सा स्वर्ग
कब चाहा था उसने
फ़ूलों के बीज़ दिखाकर
बाहर-भीतर
ये कैक्टस बोए किसने?
*****

18 February, 2012

आमआदमी का गीत

(स्व.जनकवि-गीतकार मोहम्मद सदीक को समर्पित)

जानता है सब मगर, बोलता नहीं
आम-आदमी जुबान खोलता नहीं

है उसे मालूम, क्या हो रहा है क्यूं
उसका भाग, ये अंधेरे ढो रहा है क्यूं
उसका घर, सुख क्यूं टटोलता नहीं

दीन-हीन बेटे उसके, मरे जेल में
कौन है असल खिलाड़ी, मौत-खेल में
जाने हर कोई, होंठ खोलता नहीं

छोड़े थे कुत्ते चोरों की, सूंघ के लिए
कुत्ते सारे हाकिमों के, घर को हो लिए
पालतू हरेक कुत्ता, भौंकता नहीं

जानता है सच वह, हड़ताल-बंद का
वही भोगता है दंड, इस अफ़ंड का
भूख-मुफ़लिसी को कोई, मौलता नहीं

बोले तो अंजाम क्या, जानता है वो
अपनी क्या औकात, पहचानता है वो
घाव सरेआम अपने, खोलता नहीं
*****

05 February, 2012

न देखे कोई नामवर...

बरसों पहले लिखा गीत जैसा कुछ आज हाथ आ गया। उन लेखन-प्रतिभाओं को समर्पित जो हमारी आलोचना-दृष्टि और आलोचकों की वजह से वह स्थान नहीं पा सकी जिसकी वे हकदार थीं...

गीत जैसा कुछ

न देखे कोई नामवर...


न देखे कोई नामवर
तू तो अपना काम कर
शब्द-शब्द कलम से
काल की टंकार भर

हर शब्द जो लिखा
काल की भट्टी पकाए
कालांतर रहे वही
होती जहां संभावनाएं
बीज फ़ूटे, फ़ूले-फ़ले
ज़मीं ऎसी तैयार कर...

इतिहासों के इतिहास में
कितने ही नाम है अनाम
कितनों ही के किए काम
दर्ज हुए औरों के नाम
हो जा खुद खबरदार
सब को खबरदार कर...

न हारे कोई, जीत ऎसा
सबको तारे, सीख ऎसा
लोग पढें सब लिख ऎसा
वेद टिके ज्यों टिक ऎसा
कोई किसी का हक न मारे
जन-जन में हुंकार भर...

16 January, 2012

इस जीवन की दौड़ अज़ब है

गीत

इस जीवन की दौड़ अज़ब है
पहुंचे कि न पहुंचे कहीं बस!
अपनी दौड़ें, दौड़े सब हैं

किसी से आगे किसी के पीछे
किसी के ऊपर किसी के नीचे
बाहर-भीतर भागम-भाग है
देखो जिधर एक दौड़-राग है
पल भर को विश्राम नहीं कहीं
काल से सांस की होड़ अज़ब है

इस जीवन की दौड़ अज़ब है

चलते-चलते ये पगडंडी
ना जाने किस पल खो जाए
जाना कहां, क्या है पाना
खोजनवारे खोज न पाए
मन के भीतर इन बीह्ड़ों के
सोच में आते मोड़ अज़ब हैं

इस जीवन की दौड़ अज़ब है


इतना जोड़ा, इतना घटाया
जांच, परख, हर सूत्र लगाया
सब से पूछा, सब ने बताया
फ़िर भी गणित ये, समझ न आया
कोई तो बूझे, क्या है उत्तर
जोड़-तोड़ में, लागे सब है

इस जीवन की, दौड़ अज़ब है

26 December, 2011

हम दो, हमारे दो

रिश्ते
सिर्फ़
हम दो
हमारे दो

सम्बन्ध
सिर्फ़ उन से
जो काम के हो

समाज
सिर्फ़ वह
जहां अपना कोई न हो

उत्सव
सिर्फ़ वहां
जहां
औपचारिक-अनौपचारिक
आयोजनों के
औपचारिक निमंत्रणों से
भीड़ इकठ्ठा हो

क्या पढा-लिखा
क्या अनपढ
आदमी रहा
आदमी से कट

सारी आत्मीयता, सगापन
रोशनी की जगमगाहटों, शाही टैंटों में
शाही दावत का स्वाद ले
अपने-अपने अंधेरों में
दुबक गया है

आदमी
सिर्फ़
एक शुभकामनाओं सहित
शगुन का लिफ़ाफ़ा
हो कर रह गया है...
*****

17 December, 2011

हो जाऊं खुद ही कलम

सम्भालता रहता हूं जड़ें
पेड़ों को, हरा-हरा रखने के लिए

हो जाना चाहता हूं चाक
अनगढ मिट्टी को, गढने के लिए

सपनें हो जाए गर हकीकत
मौका ही न दूं, आंसुओं को बहने के लिए

चाहता हूं हो जाऊं खुद ही कलम
ज़िंदगी के सफ़ों की, कविता लिखने के लिए

06 December, 2011

दो कविताएं : नवनीत पाण्डे

हो गया कवि

उस अलौकिक ने
रचा मुझे

मैंने-
देखते
समझते हुए
महसूसते हुए
बाहर को
भीतर अपने

दी गयी भाषा में
रचा फ़िर से तुम्हें
अपनी लेखनी से
बाहर
और
हो गया कवि
*****


कविता में.....

मैंने देखा था तुम्हें
पहले पहल
कविता में
फ़िर कविता में
फ़िर फ़िर कविता में
पर देखना बाकी है अभी
कविता है क्या?
कविता में.....
*****

27 November, 2011

यह प्रश्न नहीं और कहां खड़ा रहूं: दो कविताएं

यह प्रश्न नहीं

अब चिठ्ठियां नहीं के लगभग आती है
और शायद कुछ दिनों बाद
जो कभी-कभार आती हैं
वे भी न आए
जैसे
आजकल बच्चों की किताबों से
गायब हो गए हैं चिठ्ठियोंवाले पाठ
परीक्षाओं के प्रश्न-पत्रों में
नहीं पूछे जाते पत्र-लेखन वाले प्रश्न
बच्चों को मालूम ही नहीं
चिठ्ठी क्या होती है?

सारे जीवन-व्यवहार
सिमट कर रह गए हैं
एक नम्बरी यंत्र में
और धीरे-धीरे
सब कुछ बदलता जा रहा हैं
नम्बरों में
नम्बरों से ही होने लगी है अब
पहचान हमारी

एक के बाद कोई नहीं के चक्कर में
मारे जा रहे हैं बेमौत
प्यारे-घरेलू रिश्ते भी

क्या..सचमुच ही
हो जाएंगे दफ़न
इतिहास में?
ताऊ-ताई, चाचा-चाची,
भैया-भाभी,मौसा-मौसी,
बुआ-फ़ूफ़ा,साला-सलहज,
जीजा-साली आदि शब्द और रिश्ते

कितने और किसके
कंधे रहेंगे, बचेंगे
हमारी अंतिम यात्रा में
यात्रा होगी भी कि नहीं?
यह प्रश्न नहीं
कटु यथार्थ है
हमारा ही नहीं
आनेवाली पीढियों का भी
*****


कहां खड़ा रहूं


कहां खड़ा रहूं
जहां भी दिखती है ज़मीन
खड़े रहने माफ़िक
करता हूं जतन
कदमों को टिकाने की

पर जानते ही
खोखलापन-हकीकतें
ज़मीन की
डगमगाने-कांपने लगते हैं
कदम
टूट जाते हैं
सारे स्वप्न
अपने पैरों पर खड़े होने के

सच!
अब सचमुच ही होगा कठिन
ज़मीन
अब नहीं रही
एक अदद आदमी के
खड़े रहने के लिए
एक अदद
ठोस ज़मीन...
*****

18 November, 2011

बुध्द - तीन कविताएं

बुध्द-१

बु्ध्द ने
कभी
किसी से नहीं कहा
बुध्द बनों
जिसने भी देखा बुध्द को
मिला बुध्द से
बुध्द होता गया....
*****

बुध्द-२

मैंने देखा है बुद्ध को
ठीक वैसे ही
जैसे-
देखा होगा यशोधरा ने
बारह बरसों बाद
एक भिक्षु अपने द्वार पर
कहा लोगों ने..
यह बुद्ध है!

देखकर बुध्द को
आंखों में सिमट आए होंगे
पूरे बारह बरस
अंधेरों की अगवानी करती
एक नवजात की किलकारी
घुप्प अंधेरे में

अंधकारमय भविष्य देकर
भागता.....
एक हृदयहीन पति-पिता
बारह बरस बाद
फिर क्यूं यहां?
पूछा होगा यशोधरा के मौन ने

क्यों?
कहां और किस हेतु?
किया, हुआ ऐसा?
वह क्या था जिसे पाने
भटके बारह बरस बीहड़ों में
मिला वहां?
यह कमण्डल....
यह वेश.....
यह विचार...

क्या नहीं मिल सकता था यहां?
था कौन व्यवधान
बताते तो सही
एक बार!
सिर्फ एक बार
इस अकिंचन को
आजमाते तो सही.....

अब क्यों?
क्या रह गया
जो आए
लेने-देने के लिए
यह भिक्षुवेश-भिक्षापात्र
किस काम के
राहुल के लिए....

यही एक मात्र मेरा
अवदान पुत्र राहुल के लिए
सर्वस्व कल्याण राहुल के लिए
तुम भी आओ!
अपना लो यह
केवल मात्र एक सत्य है यह
पाया मैंने जो
पा लो तुम भी वो!!
*****

बुध्द-३

मैंने देखा है बुद्ध को
ठीक वैसे ही
जैसे-
देखा होगा कलिंग ने
बताया होगा कलिंग ने
पूछा होगा कलिंग ने
जिसे देख
हो गए थे बुद्ध
बुद्ध!
तथागत!
मौन!
अनुत्तरित!

आज भी दिखते हैं मुझे
कई कलिंग
अपने आस-पास
पर नहीं दिखता
दूर-दूर तक कहीं
एक भी बुद्ध
होते हुए बुद्ध......!

11 November, 2011

नित नए ईश्वर

ईश्वर ने
कब घोषित किया
अपने आपको ईश्वर
अपने हितों को साधने के लिए
हम ही रचते, रचाते रहे
अपने-अपने ईश्वर!
अपनी दुर्बलताओं को
धार्मिक आडम्बर में छुपाने के लिए
रचा गया
एक महिमामण्डित भय है ईश्वर
अवतार नहीं
बहुधारी तलवार है ईश्वर!
गूढ जटिल व्यापार है ईश्वर!

मनुष्यता और मानवीय होने के
झूठे विज्ञापन और षडयंत्र
सारे ईश्वरीय मंत्र
हमेशा ही छीनते रहे हैं जो
आदमी से आदमी होने का हक
बहुत ही सम्मोहक
ये ईश्वरीय तंत्र

छीन लेते हैं
जीवन-धर्म, कर्म-मर्म
भर देते हैं
भीतर तक
अजाने-अनंत भरम
जन्मते-जन्माते
नित नए ईश्वर
मानते-मनवाते
नित नए ईश्वर

05 November, 2011

जानना चाहता हूं

सच!
किसने कहा था तुम्हें
सबसे पहले
कड़वा!
और क्यूं?
उसने कैसे चखा था तुम्हें?
कैसे जाना स्वाद तुम्हारा
कि तुम कड़वे ही हो
झूठ क्यूं हुआ सफ़ेद
क्यों नहीं मिला उसे कोई स्वाद
किसने दिया
उसे रंग
तुम्हें स्वाद
बताओ सच!
आखिर है क्या....
तुम्हारे सच का
सच!
और झूठ का
झूठ!
मैं भी बोलना चाहता हूं बहुत कुछ
पर बोलने से पहले
जानना चाहता हूं.....
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