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02 March, 2012

स्त्री: दो कविताएं

देह तो मात्र स्थायी है

इतने बिम्ब
प्रतीक गढे तुमने
जाने क्या-क्या
कसीदे पढे तुमने
पर पढ न पाए
एक बार भी मन
लिख ही न पाए कभी मन
केवल देह तो नहीं थी मैं!
देह तो मात्र स्थायी है
उस गीत के अंतरे की
जिसे सुना तुमने देह से
और केवल स्थायी
नहीं हो सकता
एक मुक्कमल गीत
बिना अंतरे के
सुनो!!
स्थायी के साथ
अंतरा भी सुनो!
पूरा गीत सुनो!!
केवल...
केवल स्थायी नहीं!!
*****

यह नरक सा स्वर्ग कब चाहा था उसने

वह बोलती
पर किसी को सुनाई नहीं देता
वह रोती
किसी को दिखाई नहीं देता
उसकी हंसी
खतम हो गयी थी कुंवारेपन के साथ ही
कुछ भी तो नहीं था ऎसा
जिसे कह सके अपना
घर:एक सपना
जो कागज़ों में था उसके नाम
जिसमें सब थे सिवा उसके
जो सबका था
सिवा उसके
सुबह से शाम
सबके लिए खटते-खटते
सबके लिए लड़ते-लड़ते
फ़ुर्सत ही कब दी किसी ने
अपने लिए कुछ करने की,
लड़ने की
हमेशा ही रही
पीहर में बहन-बेटी
ससुराल में पत्नि-बहू
किसी ने भी नहीं महसूसा
उसकी शिराओं में बहता लहू
यह नरक सा स्वर्ग
कब चाहा था उसने
फ़ूलों के बीज़ दिखाकर
बाहर-भीतर
ये कैक्टस बोए किसने?
*****

18 February, 2012

आमआदमी का गीत

(स्व.जनकवि-गीतकार मोहम्मद सदीक को समर्पित)

जानता है सब मगर, बोलता नहीं
आम-आदमी जुबान खोलता नहीं

है उसे मालूम, क्या हो रहा है क्यूं
उसका भाग, ये अंधेरे ढो रहा है क्यूं
उसका घर, सुख क्यूं टटोलता नहीं

दीन-हीन बेटे उसके, मरे जेल में
कौन है असल खिलाड़ी, मौत-खेल में
जाने हर कोई, होंठ खोलता नहीं

छोड़े थे कुत्ते चोरों की, सूंघ के लिए
कुत्ते सारे हाकिमों के, घर को हो लिए
पालतू हरेक कुत्ता, भौंकता नहीं

जानता है सच वह, हड़ताल-बंद का
वही भोगता है दंड, इस अफ़ंड का
भूख-मुफ़लिसी को कोई, मौलता नहीं

बोले तो अंजाम क्या, जानता है वो
अपनी क्या औकात, पहचानता है वो
घाव सरेआम अपने, खोलता नहीं
*****

05 February, 2012

न देखे कोई नामवर...

बरसों पहले लिखा गीत जैसा कुछ आज हाथ आ गया। उन लेखन-प्रतिभाओं को समर्पित जो हमारी आलोचना-दृष्टि और आलोचकों की वजह से वह स्थान नहीं पा सकी जिसकी वे हकदार थीं...

गीत जैसा कुछ

न देखे कोई नामवर...


न देखे कोई नामवर
तू तो अपना काम कर
शब्द-शब्द कलम से
काल की टंकार भर

हर शब्द जो लिखा
काल की भट्टी पकाए
कालांतर रहे वही
होती जहां संभावनाएं
बीज फ़ूटे, फ़ूले-फ़ले
ज़मीं ऎसी तैयार कर...

इतिहासों के इतिहास में
कितने ही नाम है अनाम
कितनों ही के किए काम
दर्ज हुए औरों के नाम
हो जा खुद खबरदार
सब को खबरदार कर...

न हारे कोई, जीत ऎसा
सबको तारे, सीख ऎसा
लोग पढें सब लिख ऎसा
वेद टिके ज्यों टिक ऎसा
कोई किसी का हक न मारे
जन-जन में हुंकार भर...

16 January, 2012

इस जीवन की दौड़ अज़ब है

गीत

इस जीवन की दौड़ अज़ब है
पहुंचे कि न पहुंचे कहीं बस!
अपनी दौड़ें, दौड़े सब हैं

किसी से आगे किसी के पीछे
किसी के ऊपर किसी के नीचे
बाहर-भीतर भागम-भाग है
देखो जिधर एक दौड़-राग है
पल भर को विश्राम नहीं कहीं
काल से सांस की होड़ अज़ब है

इस जीवन की दौड़ अज़ब है

चलते-चलते ये पगडंडी
ना जाने किस पल खो जाए
जाना कहां, क्या है पाना
खोजनवारे खोज न पाए
मन के भीतर इन बीह्ड़ों के
सोच में आते मोड़ अज़ब हैं

इस जीवन की दौड़ अज़ब है


इतना जोड़ा, इतना घटाया
जांच, परख, हर सूत्र लगाया
सब से पूछा, सब ने बताया
फ़िर भी गणित ये, समझ न आया
कोई तो बूझे, क्या है उत्तर
जोड़-तोड़ में, लागे सब है

इस जीवन की, दौड़ अज़ब है

26 December, 2011

हम दो, हमारे दो

रिश्ते
सिर्फ़
हम दो
हमारे दो

सम्बन्ध
सिर्फ़ उन से
जो काम के हो

समाज
सिर्फ़ वह
जहां अपना कोई न हो

उत्सव
सिर्फ़ वहां
जहां
औपचारिक-अनौपचारिक
आयोजनों के
औपचारिक निमंत्रणों से
भीड़ इकठ्ठा हो

क्या पढा-लिखा
क्या अनपढ
आदमी रहा
आदमी से कट

सारी आत्मीयता, सगापन
रोशनी की जगमगाहटों, शाही टैंटों में
शाही दावत का स्वाद ले
अपने-अपने अंधेरों में
दुबक गया है

आदमी
सिर्फ़
एक शुभकामनाओं सहित
शगुन का लिफ़ाफ़ा
हो कर रह गया है...
*****

17 December, 2011

हो जाऊं खुद ही कलम

सम्भालता रहता हूं जड़ें
पेड़ों को, हरा-हरा रखने के लिए

हो जाना चाहता हूं चाक
अनगढ मिट्टी को, गढने के लिए

सपनें हो जाए गर हकीकत
मौका ही न दूं, आंसुओं को बहने के लिए

चाहता हूं हो जाऊं खुद ही कलम
ज़िंदगी के सफ़ों की, कविता लिखने के लिए

06 December, 2011

दो कविताएं : नवनीत पाण्डे

हो गया कवि

उस अलौकिक ने
रचा मुझे

मैंने-
देखते
समझते हुए
महसूसते हुए
बाहर को
भीतर अपने

दी गयी भाषा में
रचा फ़िर से तुम्हें
अपनी लेखनी से
बाहर
और
हो गया कवि
*****


कविता में.....

मैंने देखा था तुम्हें
पहले पहल
कविता में
फ़िर कविता में
फ़िर फ़िर कविता में
पर देखना बाकी है अभी
कविता है क्या?
कविता में.....
*****
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