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09 October, 2011

दो कविताएं

अंतहीन

जो देता है मुझे
क्या देता हूं मैं उसे
सिवाय कुछ
संभावनाओं के
जो देने ही से आरंभ होकर
देने पर ही
कब हुयी खतम
देना
और देते रहना
अंतहीन
जैसे
लेना
और लेते रहना
अंतहीन
*****

अपना यह घर!

तुम लिखते
बुनते जाल
रचते-रचाते
तिलिस्म शब्दों के
भरमाते
खुद को
सबको

मैं लिखता
अर्थ!
रचता
भीतर का बाहर
बाहर का भीतर
कुछ भी नहीं
सांस से इतर

तुम भटकते
सारा जहान
अनदेखा कर
अपना घर
ढहाते-बनाते
नित नए घर

पर मुझे तो
हर आंख में
दिखता
एक घर
जोहता बाट
एक घर की
जरा देखो तो सही
एक बार
अपना यह घर!
*****

01 October, 2011

स्री जो है

कहती नहीं
पालती है
भीतर-भीतर
सारे दुख
स्री जो है

भरती नहीं कभी भी
बस!
रीतती जाती है
सबको भरा रखने में
स्री जो है

पूछा ही नहीं किसी ने कभी
क्या है चाहें, इच्छाएं
हिस्से में सिर्फ़ रुदन, मौन
बांटती मुस्कराहटें
स्री जो है

24 September, 2011

अक्षर है प्रेम

अक्षर है
प्रेम
क्षरते हैं
प्रेम के आग्रह
प्रेम के आश्रय
आलंब-अवलंब
नहीं होती भाषा
कोई व्याकरण
पाठशाला
प्रेम की....
फ़िर भी
पूरे आवेग के साथ
पढा, पहचाना,
जाना जाता है
व्याप जाता है
प्रेम
जहां भी
होता है
प्रेम!

12 September, 2011

कवि के साथ: दो कविताएं

कवि के साथ

कवि के साथ बैठा
देखा!
कवि उदास है
विचलित है
आपा-धापी
संवेदनहीन
अखाड़ेबाजों की दुनिया में
उसकी कविता
चारों खाने चित है
वह गढना चाहता है
नए बिम्ब, रूपक
प्रतिमान
नए उनमान
गूंज-अनुगूंज
अपनी कविता में
व्यक्त करना चाहता है
अपने भीतर की
कुलबुलाहट, छटपटाहट को
उसी चरम, रूप में
जिसमें वह है
पर हार जाता है
अभिव्यक्ति के औज़ारों से
दुनियावी बाज़ारों से
इसीलिए
कवि उदास है
विचलित है
सिमटा है
अपने ही भीतर
असहाय
देखते हुए कविता में
कविता से इतर


कई बार बैठा
कवि के साथ
उसकी कविता में
गोष्ठियों, समारोहों में
कभी-कभी घर में भी
और शाम को
वहां भी
जहां अधितर कवि
खुद का आइना दिखाते हैं
पूरी तरह खुलकर
गर्व से बताते हैं
कवि होने के अलावा भी
वे क्या-क्या हैं
और कैसे हैं
जानने की कोशिश की
कवि को
उसकी कविता को
आश्चर्य!
कविता कहीं मेल नहीं खाती
अपने कवि से
कवि!
बिल्कुल ही अलग सा होता है
अपनी कविताई की छवि से

06 September, 2011

हमारे हाथ



अलसुबह
नींद से जागने से
रात को सोने तक
कितनी चीज़ें
गुज़रती है हाथों से होकर
पता नहीं
क्या-क्या करते हैं हाथ
पता नहीं
कुछ भी नहीं रहता टिका
हाथों के हाथ
घिस जाती है
झूठी पड़ जाती है
हस्तरेखाएं भी
वक्त गए
फ़िर भी पाले रहते हैं हम
भ्रम
सब हैं हमारे साथ
सब कुछ है
हमारे हाथ

30 August, 2011

पांच कविताएं: नवनीत पाण्डे



तुमने!
शब्द नहीं
मुझे तोड़ा है
कर दिया
अर्थहीन...


यह शब्द नहीं
मेरा अर्थ है
अगर पा सको...


आसमान को
आस मान


जड़
केवल जड़ नहीं
जन्म, जीवन और मृत्यु है
पेड़ की


पेड़
केवल पेड़ नहीं
एक रास्ता है
जड़ तक पहुंचने का
अगर कोई पहुंच सके...

12 August, 2011

पहाड़ के भीतर


चढते हुए
पहाड़ पर
रास्तों पर चलने के
अभ्यस्त पैर
डगमगाए कई बार
बहुत डराया
चेताया पहाड़ ने
पहली बार महसूसा
और जाना
पहाड़ों से बतियाते हुए
पहाड़ के भीतर
हाड़ ही नहीं
एक कोमल हृदय भी है
नेह भरा



धरती पर
धरती का ही
अंश है पहाड़
पहाड़ के हाड़ों में
भरी है
जाने कितनी उर्वरा
तभी तो पहाड़
दिखता है हरा
एक बार!
सिर्फ़ एक बार
पहाड़ के भीतर कोई
झांके तो जरा...


पहाड़ को
जिसने भी देखा है
होते हुए पहाड़
एक वही जानता है
पहाड़ का भीतर
पहाड़ अपने आप
कभी नहीं खोलता
अपना भीतर


पहाड़ खुदा तो
पहाड़ के भीतर
दिखे
कई पहाड़
अपरिचित था
पहाड़ खुद भी
अपने भीतर के पहाड़ों से



बचपन में घोटे थे
कितने पहाड़े
पर
आया ही नहीं स्मति में
कभी कोई पहाड़
पढते हुए पहाड़े
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