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02 July, 2011

कुछ कविताएं

१.
जीवन भर
जीवन की किताब के
अपरिचित पाठ्यक्रम के
अपठित अध्याय
बार-बार पढने के बावजूद
बीत जाते हैं हम
उन अध्यायों के
अनुत्तरित प्रश्नों के
उत्तर ढूंढते-ढूंढते

२.

सूरज के आने भर से
नहीं होता
सुबह का होना
न ही नींद से उठ बैठना
सुबह होना है
उठता हूं नींद से
देखने के लिए एक सुबह
एक सुबह देखना चाहती है
मुझे नींद से उठते हुए

३.

हर नदी की किस्मत में
नहीं समंदर
परंतु हर नदी में भरे हैं
अथाह समंदर
सूख जाएं भले ही
रास्ते धार के
पर बहती है
एक धार
अविरल
भीतर
होती हुयी
नदी
४.

झर झर
झर गयी
कुछ भी न रहा शेष
सिवा एक स्मृति के
झरने के

५.

उसके आने में कुछ न था
न ही उसके जाने में
लेकिन
इस आने-जाने के बीच
जो था
वह कभी
किसी
शब्द में नहीं समा पाया

६.

कितने अच्छे दिन थे
जब अच्छे हम थे
अच्छा अच्छा लगता था
सब कुछ
लोग भी थे
अच्छे अच्छे
कितने बदल गए दिन अब
बदल गए हम
बदल गए सब

30 June, 2011

जब भी चाहा लिखना तुम्हें!

इतना लिखा है
लिखता ही रहा हूं
पर जब भी चाहा
लिखना तुम्हें!
लिख नहीं पाता
एक भी शब्द
शब्दकोश का
टिक नहीं पाता

हर उपमा, प्रतीक, अलंकार
लघुत्तम
जान पड़ते हैं
तुम्हारे लिए

जाने क्या-क्या
कितनी बार
लिखा और मिटाया
शब्द-शब्द कसमसाया
फ़िर भी
सिरे नहीं चढ पाया
तुम में ढल न पाया
इबादत में कैसे आता
जब
इबारत में ही नहीं आया

25 June, 2011

दो कविताएं


संवाद



अक्षर
जब
शब्द होता है
कोई न कोई
अर्थ होता है

शब्द
जब
कहा, सुना,
लिखा, पढा जाता है
कोई न कोई
संवाद राह बनाता है

संवाद
जब होठों पर आता है
मौन हकबका जाता है


तुम्हारा मौन


तुम!
और तुम्हारा मौन..
मैं!
और मेरा मैं..
दोनों के बीच
एक अर्थहीन अर्थ
मेरा..तुम्हारा
क्या
हदें
सचमुच
इतना अपरिचित
बना देती है?

10 June, 2011

कंगूरे कह रहे हैं

कहां-कहां
कितनी-कितनी
ज़िंदा है कविता
कहां-कहां
गौरान्वित
कहां-कहां
शर्मिंदा है कविता
जहां-तहां देखो...
कवियों ही कवियों का है
बोलबाला
सब होचपौच
गड़बड़-झाला
क्या है?
कहां है?
कविता का आज
आज की कविता
क्यूं चुप, गूंगी है
कलम की आवाज़
संभावनाओं में जीते हुए
भावनाओं में बह रहे हैं
जड़ें खोखला रही है
कंगूरे कह रहे हैं

03 June, 2011

कइयों को सुखी कर जाऊंगा

मार दिया जाऊंगा
कि मर जाऊंगा
इतना तय है
कइयों को सुखी कर जाऊंगा
खतम हो जाएंगे
मेरे होने के
कई दुख मेरे साथ ही
खुलकर हंसेंगे कई चेहरे
बोलेंगे खुलकर
सोचेंगे खुलकर
कितनों को दे जाऊंगा
एक नया जीवन
मैं मरकर
नहीं कोई आरोप मेरा
किसी पर
जानता, मानता हूं
खड़ा रहा हूं जीवन भर
सब के कटघरे में
आरोपित होकर
पढी हैं सबकी भावनाएं
मेरे लिए मनोकामनाएं
व्यर्थ है कोई भ्रम पालूं
अब कहां रहा माद्दा
कि खुद को संभालूं
सारी दुश्वारियों, बीमारियों के बीज
मैने खुद ही तो बोए हैं
अच्छी तरह जानता हूं
मेरे जन्म की खुशी में
थाली बजानेवाले
मेरे मर जाने के दु:ख में
कितना रोए हैं

31 May, 2011

शिखण्डी ही शिखण्डी

तुम उसे देख रहे हो
जो दिखता ही नहीं
जो दिखता है
उसे तुम देखते ही नहीं
यह तुम्हारा नहीं
समय का स्खलन है
दृष्टियों में
गिध्द ही गिध्द समाए हैं
शब्द
जिह्वा पर ही
घबराए हुए हैं
छूटता ही नहीं
तरकश से तीर
मैदान ए जंग में
शिखण्डी ही शिखण्डी
आए हुए हैं

26 May, 2011

तलाश है उस घर की

तलाश है उस घर की
जिस में लगे कुछ
घर जैसा
न तुम दिखो
संदेहों और
अविश्वासों से घिरी
न मैं रहूं
भयाक्रांत
आशंकाओं से डरा
मिल सकता है हमें क्या
घर ऎसा?
वह घर
सिर्फ़ हो घर
किसी अनहोनी को
जिसकी कभी भी न लगे खबर
न ही
किसी नज़र की नज़र
जिसके सपनों में भी
हकीकतें ही दिखे
हम क्या होना चाहते हैं
यह नहीं
हम
क्या से क्या हुए हैं
यह दिखे....
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