गीत
इस जीवन की दौड़ अज़ब है
पहुंचे कि न पहुंचे कहीं बस!
अपनी दौड़ें, दौड़े सब हैं
किसी से आगे किसी के पीछे
किसी के ऊपर किसी के नीचे
बाहर-भीतर भागम-भाग है
देखो जिधर एक दौड़-राग है
पल भर को विश्राम नहीं कहीं
काल से सांस की होड़ अज़ब है
इस जीवन की दौड़ अज़ब है
चलते-चलते ये पगडंडी
ना जाने किस पल खो जाए
जाना कहां, क्या है पाना
खोजनवारे खोज न पाए
मन के भीतर इन बीह्ड़ों के
सोच में आते मोड़ अज़ब हैं
इस जीवन की दौड़ अज़ब है
इतना जोड़ा, इतना घटाया
जांच, परख, हर सूत्र लगाया
सब से पूछा, सब ने बताया
फ़िर भी गणित ये, समझ न आया
कोई तो बूझे, क्या है उत्तर
जोड़-तोड़ में, लागे सब है
इस जीवन की, दौड़ अज़ब है
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16 January, 2012
26 December, 2011
हम दो, हमारे दो
रिश्ते
सिर्फ़
हम दो
हमारे दो
सम्बन्ध
सिर्फ़ उन से
जो काम के हो
समाज
सिर्फ़ वह
जहां अपना कोई न हो
उत्सव
सिर्फ़ वहां
जहां
औपचारिक-अनौपचारिक
आयोजनों के
औपचारिक निमंत्रणों से
भीड़ इकठ्ठा हो
क्या पढा-लिखा
क्या अनपढ
आदमी रहा
आदमी से कट
सारी आत्मीयता, सगापन
रोशनी की जगमगाहटों, शाही टैंटों में
शाही दावत का स्वाद ले
अपने-अपने अंधेरों में
दुबक गया है
आदमी
सिर्फ़
एक शुभकामनाओं सहित
शगुन का लिफ़ाफ़ा
हो कर रह गया है...
*****
सिर्फ़
हम दो
हमारे दो
सम्बन्ध
सिर्फ़ उन से
जो काम के हो
समाज
सिर्फ़ वह
जहां अपना कोई न हो
उत्सव
सिर्फ़ वहां
जहां
औपचारिक-अनौपचारिक
आयोजनों के
औपचारिक निमंत्रणों से
भीड़ इकठ्ठा हो
क्या पढा-लिखा
क्या अनपढ
आदमी रहा
आदमी से कट
सारी आत्मीयता, सगापन
रोशनी की जगमगाहटों, शाही टैंटों में
शाही दावत का स्वाद ले
अपने-अपने अंधेरों में
दुबक गया है
आदमी
सिर्फ़
एक शुभकामनाओं सहित
शगुन का लिफ़ाफ़ा
हो कर रह गया है...
*****
17 December, 2011
हो जाऊं खुद ही कलम
सम्भालता रहता हूं जड़ें
पेड़ों को, हरा-हरा रखने के लिए
हो जाना चाहता हूं चाक
अनगढ मिट्टी को, गढने के लिए
सपनें हो जाए गर हकीकत
मौका ही न दूं, आंसुओं को बहने के लिए
चाहता हूं हो जाऊं खुद ही कलम
ज़िंदगी के सफ़ों की, कविता लिखने के लिए
पेड़ों को, हरा-हरा रखने के लिए
हो जाना चाहता हूं चाक
अनगढ मिट्टी को, गढने के लिए
सपनें हो जाए गर हकीकत
मौका ही न दूं, आंसुओं को बहने के लिए
चाहता हूं हो जाऊं खुद ही कलम
ज़िंदगी के सफ़ों की, कविता लिखने के लिए
06 December, 2011
दो कविताएं : नवनीत पाण्डे
हो गया कवि
उस अलौकिक ने
रचा मुझे
मैंने-
देखते
समझते हुए
महसूसते हुए
बाहर को
भीतर अपने
दी गयी भाषा में
रचा फ़िर से तुम्हें
अपनी लेखनी से
बाहर
और
हो गया कवि
*****
कविता में.....
मैंने देखा था तुम्हें
पहले पहल
कविता में
फ़िर कविता में
फ़िर फ़िर कविता में
पर देखना बाकी है अभी
कविता है क्या?
कविता में.....
*****
उस अलौकिक ने
रचा मुझे
मैंने-
देखते
समझते हुए
महसूसते हुए
बाहर को
भीतर अपने
दी गयी भाषा में
रचा फ़िर से तुम्हें
अपनी लेखनी से
बाहर
और
हो गया कवि
*****
कविता में.....
मैंने देखा था तुम्हें
पहले पहल
कविता में
फ़िर कविता में
फ़िर फ़िर कविता में
पर देखना बाकी है अभी
कविता है क्या?
कविता में.....
*****
27 November, 2011
यह प्रश्न नहीं और कहां खड़ा रहूं: दो कविताएं
यह प्रश्न नहीं
अब चिठ्ठियां नहीं के लगभग आती है
और शायद कुछ दिनों बाद
जो कभी-कभार आती हैं
वे भी न आए
जैसे
आजकल बच्चों की किताबों से
गायब हो गए हैं चिठ्ठियोंवाले पाठ
परीक्षाओं के प्रश्न-पत्रों में
नहीं पूछे जाते पत्र-लेखन वाले प्रश्न
बच्चों को मालूम ही नहीं
चिठ्ठी क्या होती है?
सारे जीवन-व्यवहार
सिमट कर रह गए हैं
एक नम्बरी यंत्र में
और धीरे-धीरे
सब कुछ बदलता जा रहा हैं
नम्बरों में
नम्बरों से ही होने लगी है अब
पहचान हमारी
एक के बाद कोई नहीं के चक्कर में
मारे जा रहे हैं बेमौत
प्यारे-घरेलू रिश्ते भी
क्या..सचमुच ही
हो जाएंगे दफ़न
इतिहास में?
ताऊ-ताई, चाचा-चाची,
भैया-भाभी,मौसा-मौसी,
बुआ-फ़ूफ़ा,साला-सलहज,
जीजा-साली आदि शब्द और रिश्ते
कितने और किसके
कंधे रहेंगे, बचेंगे
हमारी अंतिम यात्रा में
यात्रा होगी भी कि नहीं?
यह प्रश्न नहीं
कटु यथार्थ है
हमारा ही नहीं
आनेवाली पीढियों का भी
*****
कहां खड़ा रहूं
कहां खड़ा रहूं
जहां भी दिखती है ज़मीन
खड़े रहने माफ़िक
करता हूं जतन
कदमों को टिकाने की
पर जानते ही
खोखलापन-हकीकतें
ज़मीन की
डगमगाने-कांपने लगते हैं
कदम
टूट जाते हैं
सारे स्वप्न
अपने पैरों पर खड़े होने के
सच!
अब सचमुच ही होगा कठिन
ज़मीन
अब नहीं रही
एक अदद आदमी के
खड़े रहने के लिए
एक अदद
ठोस ज़मीन...
*****
अब चिठ्ठियां नहीं के लगभग आती है
और शायद कुछ दिनों बाद
जो कभी-कभार आती हैं
वे भी न आए
जैसे
आजकल बच्चों की किताबों से
गायब हो गए हैं चिठ्ठियोंवाले पाठ
परीक्षाओं के प्रश्न-पत्रों में
नहीं पूछे जाते पत्र-लेखन वाले प्रश्न
बच्चों को मालूम ही नहीं
चिठ्ठी क्या होती है?
सारे जीवन-व्यवहार
सिमट कर रह गए हैं
एक नम्बरी यंत्र में
और धीरे-धीरे
सब कुछ बदलता जा रहा हैं
नम्बरों में
नम्बरों से ही होने लगी है अब
पहचान हमारी
एक के बाद कोई नहीं के चक्कर में
मारे जा रहे हैं बेमौत
प्यारे-घरेलू रिश्ते भी
क्या..सचमुच ही
हो जाएंगे दफ़न
इतिहास में?
ताऊ-ताई, चाचा-चाची,
भैया-भाभी,मौसा-मौसी,
बुआ-फ़ूफ़ा,साला-सलहज,
जीजा-साली आदि शब्द और रिश्ते
कितने और किसके
कंधे रहेंगे, बचेंगे
हमारी अंतिम यात्रा में
यात्रा होगी भी कि नहीं?
यह प्रश्न नहीं
कटु यथार्थ है
हमारा ही नहीं
आनेवाली पीढियों का भी
*****
कहां खड़ा रहूं
कहां खड़ा रहूं
जहां भी दिखती है ज़मीन
खड़े रहने माफ़िक
करता हूं जतन
कदमों को टिकाने की
पर जानते ही
खोखलापन-हकीकतें
ज़मीन की
डगमगाने-कांपने लगते हैं
कदम
टूट जाते हैं
सारे स्वप्न
अपने पैरों पर खड़े होने के
सच!
अब सचमुच ही होगा कठिन
ज़मीन
अब नहीं रही
एक अदद आदमी के
खड़े रहने के लिए
एक अदद
ठोस ज़मीन...
*****
18 November, 2011
बुध्द - तीन कविताएं
बुध्द-१
बु्ध्द ने
कभी
किसी से नहीं कहा
बुध्द बनों
जिसने भी देखा बुध्द को
मिला बुध्द से
बुध्द होता गया....
*****
बुध्द-२
मैंने देखा है बुद्ध को
ठीक वैसे ही
जैसे-
देखा होगा यशोधरा ने
बारह बरसों बाद
एक भिक्षु अपने द्वार पर
कहा लोगों ने..
यह बुद्ध है!
देखकर बुध्द को
आंखों में सिमट आए होंगे
पूरे बारह बरस
अंधेरों की अगवानी करती
एक नवजात की किलकारी
घुप्प अंधेरे में
अंधकारमय भविष्य देकर
भागता.....
एक हृदयहीन पति-पिता
बारह बरस बाद
फिर क्यूं यहां?
पूछा होगा यशोधरा के मौन ने
क्यों?
कहां और किस हेतु?
किया, हुआ ऐसा?
वह क्या था जिसे पाने
भटके बारह बरस बीहड़ों में
मिला वहां?
यह कमण्डल....
यह वेश.....
यह विचार...
क्या नहीं मिल सकता था यहां?
था कौन व्यवधान
बताते तो सही
एक बार!
सिर्फ एक बार
इस अकिंचन को
आजमाते तो सही.....
अब क्यों?
क्या रह गया
जो आए
लेने-देने के लिए
यह भिक्षुवेश-भिक्षापात्र
किस काम के
राहुल के लिए....
यही एक मात्र मेरा
अवदान पुत्र राहुल के लिए
सर्वस्व कल्याण राहुल के लिए
तुम भी आओ!
अपना लो यह
केवल मात्र एक सत्य है यह
पाया मैंने जो
पा लो तुम भी वो!!
*****
बुध्द-३
मैंने देखा है बुद्ध को
ठीक वैसे ही
जैसे-
देखा होगा कलिंग ने
बताया होगा कलिंग ने
पूछा होगा कलिंग ने
जिसे देख
हो गए थे बुद्ध
बुद्ध!
तथागत!
मौन!
अनुत्तरित!
आज भी दिखते हैं मुझे
कई कलिंग
अपने आस-पास
पर नहीं दिखता
दूर-दूर तक कहीं
एक भी बुद्ध
होते हुए बुद्ध......!
बु्ध्द ने
कभी
किसी से नहीं कहा
बुध्द बनों
जिसने भी देखा बुध्द को
मिला बुध्द से
बुध्द होता गया....
*****
बुध्द-२
मैंने देखा है बुद्ध को
ठीक वैसे ही
जैसे-
देखा होगा यशोधरा ने
बारह बरसों बाद
एक भिक्षु अपने द्वार पर
कहा लोगों ने..
यह बुद्ध है!
देखकर बुध्द को
आंखों में सिमट आए होंगे
पूरे बारह बरस
अंधेरों की अगवानी करती
एक नवजात की किलकारी
घुप्प अंधेरे में
अंधकारमय भविष्य देकर
भागता.....
एक हृदयहीन पति-पिता
बारह बरस बाद
फिर क्यूं यहां?
पूछा होगा यशोधरा के मौन ने
क्यों?
कहां और किस हेतु?
किया, हुआ ऐसा?
वह क्या था जिसे पाने
भटके बारह बरस बीहड़ों में
मिला वहां?
यह कमण्डल....
यह वेश.....
यह विचार...
क्या नहीं मिल सकता था यहां?
था कौन व्यवधान
बताते तो सही
एक बार!
सिर्फ एक बार
इस अकिंचन को
आजमाते तो सही.....
अब क्यों?
क्या रह गया
जो आए
लेने-देने के लिए
यह भिक्षुवेश-भिक्षापात्र
किस काम के
राहुल के लिए....
यही एक मात्र मेरा
अवदान पुत्र राहुल के लिए
सर्वस्व कल्याण राहुल के लिए
तुम भी आओ!
अपना लो यह
केवल मात्र एक सत्य है यह
पाया मैंने जो
पा लो तुम भी वो!!
*****
बुध्द-३
मैंने देखा है बुद्ध को
ठीक वैसे ही
जैसे-
देखा होगा कलिंग ने
बताया होगा कलिंग ने
पूछा होगा कलिंग ने
जिसे देख
हो गए थे बुद्ध
बुद्ध!
तथागत!
मौन!
अनुत्तरित!
आज भी दिखते हैं मुझे
कई कलिंग
अपने आस-पास
पर नहीं दिखता
दूर-दूर तक कहीं
एक भी बुद्ध
होते हुए बुद्ध......!
11 November, 2011
नित नए ईश्वर
ईश्वर ने
कब घोषित किया
अपने आपको ईश्वर
अपने हितों को साधने के लिए
हम ही रचते, रचाते रहे
अपने-अपने ईश्वर!
अपनी दुर्बलताओं को
धार्मिक आडम्बर में छुपाने के लिए
रचा गया
एक महिमामण्डित भय है ईश्वर
अवतार नहीं
बहुधारी तलवार है ईश्वर!
गूढ जटिल व्यापार है ईश्वर!
मनुष्यता और मानवीय होने के
झूठे विज्ञापन और षडयंत्र
सारे ईश्वरीय मंत्र
हमेशा ही छीनते रहे हैं जो
आदमी से आदमी होने का हक
बहुत ही सम्मोहक
ये ईश्वरीय तंत्र
छीन लेते हैं
जीवन-धर्म, कर्म-मर्म
भर देते हैं
भीतर तक
अजाने-अनंत भरम
जन्मते-जन्माते
नित नए ईश्वर
मानते-मनवाते
नित नए ईश्वर
कब घोषित किया
अपने आपको ईश्वर
अपने हितों को साधने के लिए
हम ही रचते, रचाते रहे
अपने-अपने ईश्वर!
अपनी दुर्बलताओं को
धार्मिक आडम्बर में छुपाने के लिए
रचा गया
एक महिमामण्डित भय है ईश्वर
अवतार नहीं
बहुधारी तलवार है ईश्वर!
गूढ जटिल व्यापार है ईश्वर!
मनुष्यता और मानवीय होने के
झूठे विज्ञापन और षडयंत्र
सारे ईश्वरीय मंत्र
हमेशा ही छीनते रहे हैं जो
आदमी से आदमी होने का हक
बहुत ही सम्मोहक
ये ईश्वरीय तंत्र
छीन लेते हैं
जीवन-धर्म, कर्म-मर्म
भर देते हैं
भीतर तक
अजाने-अनंत भरम
जन्मते-जन्माते
नित नए ईश्वर
मानते-मनवाते
नित नए ईश्वर
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