मां रोका, टोका करती थी
कई बातों के लिए
पर नहीं मानता था
नहीं जानता था
मां क्यूं रोक, टोक रही है?
क्या इसलिए कि
मां ने देख रखी थी दुनिया
मुझे भी दिखाना चाहती थी दुनिया
और बचाना चाहती थी मुझे उन भूलों, शूलों से
या मां बचना चाहती थी खुद
उस अनहोनी से
जो हो सकती थी मेरी करतूतों से
कितनी ही सीखें दी थी मां ने
किसी लायक बनाने के लिए
पर मैं नालायक ही रहा
अपनी ही राह चलता रहा
न जाने क्यूं?
किस सांचे ढलता रहा
मां ने भी आखिर
कर लिया स्वीकार
थक थकाकर मान ली थी हार
साध लिया मौन
जब भी पुकारता हूं-मां! मां!
मां पूछती है- कौन?
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07 February, 2011
04 February, 2011
प्रेम के अंत की शुरुआत
बोलती तो मैं पहले भी ऎसे ही थी
हंसी में भी कोई नयापन नहीं
फ़िर अब ऎसा क्या हो गया
तुम्हें मेरा बोलना सुहाता नहीं
कहते हो-
हंसना मुझे आता ही नहीं
मेरा साथ भाता नहीं
यह कौन सा और कैसा रंग है
तुम्हारे प्रेम का
क्या सचमुच ही
प्रेम के अंत की शुरुआत है
विवाह
हंसी में भी कोई नयापन नहीं
फ़िर अब ऎसा क्या हो गया
तुम्हें मेरा बोलना सुहाता नहीं
कहते हो-
हंसना मुझे आता ही नहीं
मेरा साथ भाता नहीं
यह कौन सा और कैसा रंग है
तुम्हारे प्रेम का
क्या सचमुच ही
प्रेम के अंत की शुरुआत है
विवाह
03 February, 2011
कितनी रिव्यू आई...
ढूंढ रहा हूं वे शब्द
जो व्यक्त कर सके उस अनुभूति को
जो मेरे भीतर है
भाषा खामोश
चुप! सारे शब्दकोश
न जाने कब से मेरी कलम
बोये जा रही है बीज शब्दों के
पर कहां होती है फ़सल अच्छी
हर बार वही टुच्ची की टुच्ची
लेता ही रहता हूं विशेषज्ञों की राय
और नुस्खे
आजमाता ही रहता हूं
पारंपरिक,आधुनिक
उत्तर आधुनिक तीर-तुक्के, तौर तरीके
पर सब बेकार
होती ही नहीं अच्छी पैदावार
क्या करें यार!
कहां जा छुपी है रसधार!
लगता ही नहीं जब गंधार..
मध्यम क्या करेगा..
होगा क्या कभी?
मेरी अनुभूति का प्रसव
या
बांझ ही मर जाएगी
लावारिश..बेशिनाख्त
गर्भ में ही गिर जाएगी?
होगी कहीं दरियाफ़्त
कहां करें रपट
कहां है वट
कब तक भोगूं कष्ट
लगती है कहीं कचहरी
लिखनेवालों की?
दुनिया हो गई कार्पोरेट
कार्पोरॆट घरानों की
कौन रखता है खबर
घुमंतू, फ़ेरीवालों की
होती है क्या?
कहीं सुनवाई..
आलोचक तो.....
आप सब जानते हैं भाई!
चलिए छोडिए इस रामायण को!
बताइए!
आपकी कहां कहां..
कितनी रिव्यू आई...
जो व्यक्त कर सके उस अनुभूति को
जो मेरे भीतर है
भाषा खामोश
चुप! सारे शब्दकोश
न जाने कब से मेरी कलम
बोये जा रही है बीज शब्दों के
पर कहां होती है फ़सल अच्छी
हर बार वही टुच्ची की टुच्ची
लेता ही रहता हूं विशेषज्ञों की राय
और नुस्खे
आजमाता ही रहता हूं
पारंपरिक,आधुनिक
उत्तर आधुनिक तीर-तुक्के, तौर तरीके
पर सब बेकार
होती ही नहीं अच्छी पैदावार
क्या करें यार!
कहां जा छुपी है रसधार!
लगता ही नहीं जब गंधार..
मध्यम क्या करेगा..
होगा क्या कभी?
मेरी अनुभूति का प्रसव
या
बांझ ही मर जाएगी
लावारिश..बेशिनाख्त
गर्भ में ही गिर जाएगी?
होगी कहीं दरियाफ़्त
कहां करें रपट
कहां है वट
कब तक भोगूं कष्ट
लगती है कहीं कचहरी
लिखनेवालों की?
दुनिया हो गई कार्पोरेट
कार्पोरॆट घरानों की
कौन रखता है खबर
घुमंतू, फ़ेरीवालों की
होती है क्या?
कहीं सुनवाई..
आलोचक तो.....
आप सब जानते हैं भाई!
चलिए छोडिए इस रामायण को!
बताइए!
आपकी कहां कहां..
कितनी रिव्यू आई...
02 February, 2011
हवाओं के साए में एक नन्हा दीया?
मत याद दिलाइए कृपया!
मुझे मेरे दुखों की
सब करते हैं बातें दुख बांटने की
पर मुझे नहीं लगा
बंटा है दुख कभी
जब भी बात चलायी
याद दिलायी किसी ने दुख की
दुख ने और दुखी किया
आंखों को नम किया
कैसे बांट सकता है रोशनी भला!
हवाओं के साए में एक नन्हा दीया?
मुझे मेरे दुखों की
सब करते हैं बातें दुख बांटने की
पर मुझे नहीं लगा
बंटा है दुख कभी
जब भी बात चलायी
याद दिलायी किसी ने दुख की
दुख ने और दुखी किया
आंखों को नम किया
कैसे बांट सकता है रोशनी भला!
हवाओं के साए में एक नन्हा दीया?
29 January, 2011
प्रेम की प्रथम अभिव्यक्ति
मुस्कान
अर्थात
एक प्यारा सा गान
प्रेम का
जो गालों की सरगम और
अधरों के साज पर बजते हुए
संपूर्ण
बाहर भीतर को आंदोलित करता है
प्रेम की मानिंद
मुस्कान भी
किस्मत और
मुश्किल से मिलती है
इसीलिए तो मैं बोलूं...
मुस्कान ही
प्रेम की प्रथम अभिव्यक्ति है!!
अर्थात
एक प्यारा सा गान
प्रेम का
जो गालों की सरगम और
अधरों के साज पर बजते हुए
संपूर्ण
बाहर भीतर को आंदोलित करता है
प्रेम की मानिंद
मुस्कान भी
किस्मत और
मुश्किल से मिलती है
इसीलिए तो मैं बोलूं...
मुस्कान ही
प्रेम की प्रथम अभिव्यक्ति है!!
26 January, 2011
पिंजरे में दुबारा
उसने सचमुच ही कर लिया किनारा
दिल फ़िर हो गया मारा मारा
उसको क्या कहें और क्यूं
दिल का ही तो था कसूर है सारा
कोशिशें तो बहुत की बचाने की
फ़िर भी तिनका तिनका हो गया सारा
उम्र बीत जाएगी शायद अब झुलस में
जाने कब मिलेगा छांव का सहारा
जाने कैसा रिश्ता है कैसा ये लगाव
क्या ये किस्सा क्या ये नज़ारा
उसने तो किया था परिंदा आजाद
फ़िर भी आ बैठा पिंजरे में दुबारा
दिल फ़िर हो गया मारा मारा
उसको क्या कहें और क्यूं
दिल का ही तो था कसूर है सारा
कोशिशें तो बहुत की बचाने की
फ़िर भी तिनका तिनका हो गया सारा
उम्र बीत जाएगी शायद अब झुलस में
जाने कब मिलेगा छांव का सहारा
जाने कैसा रिश्ता है कैसा ये लगाव
क्या ये किस्सा क्या ये नज़ारा
उसने तो किया था परिंदा आजाद
फ़िर भी आ बैठा पिंजरे में दुबारा
06 January, 2011
मज़ा जो आता है....
हम अपनी कुछ आदतों से
बहुत परेशान हैं
छोडना चाहते हैं उन्हें
पाना चाहते हैं निजात
पूरी तरह उनसे
उस चाय काफ़ी,
खैनी, सिगरेट, दारु की तरह नहीं
जिसे जब चाहा छोड दिया
और जब चाहे
फ़िर से शुरु हो गए
छोडना चाहते हैं ऎसे कि
स्मृति में भी न रहे
कि कोई कहे
हम ऎसे भी रहे
पर कहां हो पाता है
किसी की भी हंसी उडाने
कहीं पर भी टांग अडाने
अपना उल्लू सीधा करने
अंगुली करने में
मज़ा जो आता है.....
बहुत परेशान हैं
छोडना चाहते हैं उन्हें
पाना चाहते हैं निजात
पूरी तरह उनसे
उस चाय काफ़ी,
खैनी, सिगरेट, दारु की तरह नहीं
जिसे जब चाहा छोड दिया
और जब चाहे
फ़िर से शुरु हो गए
छोडना चाहते हैं ऎसे कि
स्मृति में भी न रहे
कि कोई कहे
हम ऎसे भी रहे
पर कहां हो पाता है
किसी की भी हंसी उडाने
कहीं पर भी टांग अडाने
अपना उल्लू सीधा करने
अंगुली करने में
मज़ा जो आता है.....
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