हर बार की तरह
इस बार भी चला गया वह
झगडा करके
हर बार की तरह
इस बार भी कोई खास वजह नहीं थी
झगडे की
उसे झगडना ही था
सो झगडा
उसे जाना ही था
सो गया
फ़िर आने के लिए
फ़िर झगडने के लिए
नया कुछ भी नहीं था
न वह
न मैं
न ये झगडे
न यह आवाजाही
सिवा इसके कि
प्यार से
प्यार की
एक नई पहचान हो रही थी
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16 November, 2010
12 November, 2010
ये स्त्री जात......
स्त्री सबसे बांटती है
अपने स्त्री होने का सुख
पर नहीं बांटती
किसी से भी
अपना एक भी दुख
स्त्री
सब कुछ सुनती है
पर
कहती कुछ भी नहीं
कभी किसी से
कितना बोलता है
स्त्री का मौन
पर कौन सुनता है
खुद
स्त्री भी नहीं सुनती
अपने मन की कोई बात
आखिर क्यूं है ऎसी?
ये स्त्री जात......
अपने स्त्री होने का सुख
पर नहीं बांटती
किसी से भी
अपना एक भी दुख
स्त्री
सब कुछ सुनती है
पर
कहती कुछ भी नहीं
कभी किसी से
कितना बोलता है
स्त्री का मौन
पर कौन सुनता है
खुद
स्त्री भी नहीं सुनती
अपने मन की कोई बात
आखिर क्यूं है ऎसी?
ये स्त्री जात......
09 November, 2010
याद बहुत आते हैं कुछ लोग
याद बहुत आते हैं कुछ लोग
तस्वीर हो जाने के बाद
हम कितने अकेले हो जाते हैं
उनके अचानक,
चले जाने के बाद
कल ही तो मिले थे
एकदम ठीक ठाक
कितनी मज़ेदार थी
उनसे मुलाकात
फ़िर ऎसा क्या हो गया
यह अकस्मात
उन चेहरों से हम
अक्सर बतियाते हैं
स्मृतियों में कितने ही गवाक्ष
अनायास खुल जाते हैं
होठों से निकल पडती है
उन्हीं की कही कोई बात
बात बात में हो जाती है
बस, उन्हीं की बात
उठने, बैठने, चलने,
बोलने का ढंग
सजीव हो उठते हैं
तस्वीर के हर रंग
करने लगते हैं अनायास
हम उनसे संवाद
रह रह कर यूं
सताती उनकी याद
तस्वीर हो जाने के बाद
हम कितने अकेले हो जाते हैं
उनके अचानक,
चले जाने के बाद
कल ही तो मिले थे
एकदम ठीक ठाक
कितनी मज़ेदार थी
उनसे मुलाकात
फ़िर ऎसा क्या हो गया
यह अकस्मात
उन चेहरों से हम
अक्सर बतियाते हैं
स्मृतियों में कितने ही गवाक्ष
अनायास खुल जाते हैं
होठों से निकल पडती है
उन्हीं की कही कोई बात
बात बात में हो जाती है
बस, उन्हीं की बात
उठने, बैठने, चलने,
बोलने का ढंग
सजीव हो उठते हैं
तस्वीर के हर रंग
करने लगते हैं अनायास
हम उनसे संवाद
रह रह कर यूं
सताती उनकी याद
07 November, 2010
06 November, 2010
हे ईश्वर!
हे ईश्वर!
लोग कहते हैं
तुम सब देखते हो
कुछ नहीं छिपा तुम से
मैं बचपन से ही
देखता आया हूं तुझे
पर क्या तुमने भी कभी
देखा मुझे?
पता नहीं
किसने थमायी थी
मेरी अंगुली, तुझे
उस भूल ने आज तक
नहीं जीने दिया चैन से मुझे
मैंने कभी, कहीं नहीं देखा तुझे
पर देखता आया हूं
तुम्हारे ठाठबाट और मज़े
हर दिन सजेधजे
सबको पजाए रहते हो
पर खुद!!
खुद आज तक कहीं नहीं पजे
लोग कहते हैं
तुम सब देखते हो
कुछ नहीं छिपा तुम से
मैं बचपन से ही
देखता आया हूं तुझे
पर क्या तुमने भी कभी
देखा मुझे?
पता नहीं
किसने थमायी थी
मेरी अंगुली, तुझे
उस भूल ने आज तक
नहीं जीने दिया चैन से मुझे
मैंने कभी, कहीं नहीं देखा तुझे
पर देखता आया हूं
तुम्हारे ठाठबाट और मज़े
हर दिन सजेधजे
सबको पजाए रहते हो
पर खुद!!
खुद आज तक कहीं नहीं पजे
01 November, 2010
ज़िंदगी के एलबम में
ज़िंदगी के एलबम में
कुछ तस्वीरें
होती हैं कितनी सुंदर
जब तब
आ ही खडी होती है सामने
साल, महिने
समय का हर बंध लांघकर
हम
जीने लगते हैं पुन:वे पल
अपनी स्मृतियों के आंगन
उन तस्वीरों के साथ
अपने ही भीतर
कितने प्यारे,
जरुरी है ये एलबम
ज़िंदगी में
ज़िंदगी के लिए
कितना तडफ़डाती है ज़िंदगी
ऎसे एलबमों के लिए
तस्वीरों में कैद पलों के साथ
फ़िर जीने के लिए
कुछ तस्वीरें
होती हैं कितनी सुंदर
जब तब
आ ही खडी होती है सामने
साल, महिने
समय का हर बंध लांघकर
हम
जीने लगते हैं पुन:वे पल
अपनी स्मृतियों के आंगन
उन तस्वीरों के साथ
अपने ही भीतर
कितने प्यारे,
जरुरी है ये एलबम
ज़िंदगी में
ज़िंदगी के लिए
कितना तडफ़डाती है ज़िंदगी
ऎसे एलबमों के लिए
तस्वीरों में कैद पलों के साथ
फ़िर जीने के लिए
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