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22 October, 2010

राह कभी नहीं भूलती

राह कभी नहीं भूलती
उन कदमों को
जो बनाते हैं उसे राह
हर राह के पास है
एक इतिहास कदमों का
कदम जो चलते हैं
कदम जो राह बनाते हैं
अब कहां रहे कदम
राह बनाने वाले
रह गए सिर्फ़
लीक पीटनेवाले
हाथों में झण्डे वाले
वे कदम चाहते ही नहीं
अपनी कोई राह बनाना
खुद को आज़माना
बस! चले जा रहे हैं
किसी भी राह पर
क्यूं? पता नहीं
कहां? पता नहीं

18 October, 2010

दौड जरुरी है

मेरे पास नहीं है अवसर कि
इंतज़ार करुं अवसर का
फ़ितरत ही नहीं कि
किसी को औज़ार बनाऊं कि
बनूं किसी का औज़ार
जानता हूं, बहुत कठिन है
किसी से भी निभाना
कोई चाहता ही नहीं
किसी के कुछ काम आना
बहानों का ज़माना है
सबके पास है
कोई न कोई बहाना
अंगुली करने से फ़ुरसत मिले तो
किसी की अंगुली थामें
पता नहीं किन हाथों में हैं
हम सब की लगामें
आह!
कितनी कठिन है राह
पढ लिए सफ़लताओं के साधन
बदल गए
जीवनमूल्य सरोकार, संसाधन
आजमा लिए बाबाओं के सारे नुस्खे
भूखे आज भी है भूखे
क्यूं रुकें, किसके लिए रुकें
क्यों चूकें, किसके लिए चूकें
आओ जागें! हम भी भागें!
भागना मजबूरी हैं
काल से ताल के लिए
होड जरुरी है
दौड जरुरी है

14 October, 2010

कुछ आहटें

कुछ आहटें
कितनी अधिक परिचित होती है
आईने सी
कभी भी कहीं भी
आ धमकती है
सबके सामने
सबके बीच
बेआवाज़
लेकिन
कितना कोलाहल भर देती है
किसी को पता भी नहीं चलता
हम सबके साथ
सबके बीच होते हुए भी
किसी के साथ
किसी के बीच नहीं है
अपनी ही किसी
आहट के बीच,
कितनी आहत के साथ हैं

10 October, 2010

शैन: शैन:

नया
पहना
मैला किया
धोया, सुखोया
फ़िर पहन लिया
फ़ट गया तो
फ़िर नया,
कितने रंग,
कितने ढंग
कितने दिन
किसके संग
फ़िर गया
फ़िर नया
वही प्रक्रिया
पुन: पुन:
यूंही
झरता जाता है
शैन: शैन:

20 August, 2010

बातें हकों की

छोडो बातें हकों की
नेतागिरी है सिर्फ़ नफ़ों की
नारे सिर्फ़ नारे हो गए
संगठन बेचारे हो गए
मशालें अब कौन थामे
हाथ हलकारे हो गए

ज़िंदगी का मतलब
सिर्फ़ सांसे लेना हो गया
रगों का खून,
लाल रंग हो के रह गया
अर्थ और स्वार्थ के
वारे न्यारे हो गए

ज़ुबां बेज़ुबान,
कान भी अकान है
बाज़ारों के मकडजाल में
खोया, उलझा इंसान है
हम कितने मजबूर
बेसहारे हो गए

15 August, 2010

पंद्रह अगस्त

सपने त्रस्त
हौसले पस्त
हम सब अभ्यस्त
मस्त हो रही
पंद्रह अगस्त

जीवन है सख्त
कितना कंबख्त
नीरस, विरक्त
मस्त हो रही
पंद्रह अगस्त

शासक सशक्त
अपने में व्यस्त
मतलबपरस्त
मस्त हो रही
पंद्र्ह अगस्त

कंगूरे ध्वस्त
सूरज है अस्त
कैसा ये वक्त
मस्त हो रही
पंद्रह अगस्त

04 August, 2010

सैंग कैवै

सैंग कैवै-
लिखो राजस्थानी
सीखो राजस्थानी
म्हारो बी जी
घणो ईज तडफ़ा तोडै
लिखूं राजस्थानी,
बोलूं राजस्थानी
सीखूं राजस्थानी
पण जद देखूं च्यारूंपासी
आवै म्हनै हांसी...
राजस्थानी रा झंडा च्यारुं कानीं
पर किण सांचै हियै, मूंडै राजस्थानी
लिखारा लिखै घणी ईज राजस्थानी
पण भणै कुण
लिखारा ईज नीं भणै
लिखारां री लिखी राजस्थानी
न नार राजस्थानी, न भरतार राजस्थानी
न घर राजस्थानी, न बाजार राजस्थानी
न पैरूंकार राजस्थानी न सरकार राजस्थानी
मायड. भासा रै हक री आ लडाई
तद तांई लागै थोथी
जद तांई नीं आवै राजस्थानी रा लाडेसरां रै हाथ
राजस्थानी री पैली पोथी
वगत रो तकादो
खोसनै खावै जिको जीत में रैवै
मंगतां नै सापतो लाडू
कोई नीं देवै...
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