जहां पहुंच कर
होंठ हो जाते हैं गूंगे
आंखें अंधी और कान बहरे
समझ,नासमझ
और मन
अनमना
पूरी हो जाती है हद
हर भाषा की
अभिव्यक्ति बेबस
बंध, निर्बंध
संवेदन की इति से अथ तक
कविता, कहानी, उपन्यास
लेखन की हर विधा से बाहर
जो नहीं बंधते किसी धर्म,संस्कार,
समाज, देश, काल, वातावरण जाल में
नहीं बोलते कभी
किसी मंच, सभा, भीड़, एकांत,
शांत-प्रशांत में
भरे पड़े हैं
जाने कहां-कहां
इस जीवन में
इसी जीवन के
छूटे हुए संदर्भ
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07 July, 2010
04 July, 2010
दिल्ली
दिल्ली
केवल नाम नहीं है किसी षहर का
पहचान है एक देष की
प्राण है एक देष का
यह अलग बात है-
दिल्ली में एक नहीं
कई दिल्लियां हैं-
पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली,
दिल्ली कैंट, दिल्ली सदर आदि- आदि
हर दिल्ली के अपने रंग,
अपने कानून- क़ायदे
आपकी दिल्ली, मेरी दिल्ली
ज़ामा मस्ज़िद वाली दिल्ली
बिड़ला मंदिर वाली दिल्ली
शीशगंज गुरूद्वारे वाली दिल्ली
चर्चगेट वाली दिल्ली
साहित्य अकादमी वाली दिल्ली
हिन्दी ग्रंथ अकादमी वाली दिल्ली
एनएसडी वाली दिल्ली
जवाहरलाल नेहरु विष्वविद्यालय वाली दिल्ली
महात्मा गांधी विष्वविद्यालय वाली दिल्ली
दिल्ली की सोच में
दिल्ली दिल वालों की है
दिल्ली से बाहर की खबर के अनुसार
दिल्ली दिल्ली वालों की है
दिल्ली किसकी है?
इस प्रश्न का सही- सही उत्तर
स्वयं दिल्ली के पास भी नहीं है
वह तो सभी को अपना मानती है
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
पहुंचता है दिल्ली का अख़बार
हर गली, गांव, शहर की दीवारें उठाए हैं
दिल्ली के इष्तहार
आंखे देखती हैं- दिल्ली
कान सुनते हैं- दिल्ली
होंठ बोलते हैं- दिल्ली
सब करते हैं-
दिल्ली का एतबार
दिल्ली का इंतज़ार
दिल्ली की जयकार
पैरों में पंख लग जाते हैं
सुनते ही दिल्ली की पुकार
दुबक जाते हैं सुनते ही
दिल्ली की फटकार
दिल्ली की ललकार
सब को जानती है दिल्ली
सब को छानती है दिल्ली
सब को पालती है दिल्ली
सब को ढालती है दिल्ली
दिल्लीः
अर्थात् प्रेयसी का दिल
दिल्लीः
अर्थात् प्रेमी की मंजिल
दिल्लीः
अर्थात् सरकार
दिल्लीः
अर्थात् दरबार।
केवल नाम नहीं है किसी षहर का
पहचान है एक देष की
प्राण है एक देष का
यह अलग बात है-
दिल्ली में एक नहीं
कई दिल्लियां हैं-
पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली,
दिल्ली कैंट, दिल्ली सदर आदि- आदि
हर दिल्ली के अपने रंग,
अपने कानून- क़ायदे
आपकी दिल्ली, मेरी दिल्ली
ज़ामा मस्ज़िद वाली दिल्ली
बिड़ला मंदिर वाली दिल्ली
शीशगंज गुरूद्वारे वाली दिल्ली
चर्चगेट वाली दिल्ली
साहित्य अकादमी वाली दिल्ली
हिन्दी ग्रंथ अकादमी वाली दिल्ली
एनएसडी वाली दिल्ली
जवाहरलाल नेहरु विष्वविद्यालय वाली दिल्ली
महात्मा गांधी विष्वविद्यालय वाली दिल्ली
दिल्ली की सोच में
दिल्ली दिल वालों की है
दिल्ली से बाहर की खबर के अनुसार
दिल्ली दिल्ली वालों की है
दिल्ली किसकी है?
इस प्रश्न का सही- सही उत्तर
स्वयं दिल्ली के पास भी नहीं है
वह तो सभी को अपना मानती है
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
पहुंचता है दिल्ली का अख़बार
हर गली, गांव, शहर की दीवारें उठाए हैं
दिल्ली के इष्तहार
आंखे देखती हैं- दिल्ली
कान सुनते हैं- दिल्ली
होंठ बोलते हैं- दिल्ली
सब करते हैं-
दिल्ली का एतबार
दिल्ली का इंतज़ार
दिल्ली की जयकार
पैरों में पंख लग जाते हैं
सुनते ही दिल्ली की पुकार
दुबक जाते हैं सुनते ही
दिल्ली की फटकार
दिल्ली की ललकार
सब को जानती है दिल्ली
सब को छानती है दिल्ली
सब को पालती है दिल्ली
सब को ढालती है दिल्ली
दिल्लीः
अर्थात् प्रेयसी का दिल
दिल्लीः
अर्थात् प्रेमी की मंजिल
दिल्लीः
अर्थात् सरकार
दिल्लीः
अर्थात् दरबार।
02 July, 2010
एक और प्रेम कविता
प्रेम
तुम केवल प्रेम क्यूं नहीं हो
क्यूं है तुम्हारे साथ
तुम्हारी चाह
तुम्हारी आह
क्यूं बेकल है हर कोई
जानने के लिए
तुम्हारी थाह
ओ प्रेम!
आखिर क्या है
तुम्हारा रूप, स्वरूप
तुम!
मौन
वाचाल
भीतर
बाहर
व्यक्त
अव्यक्त
निज
सार्वजनिक
क्या हो तुम?
क्या है तुम्हारी पहचान
कहां है तुम्हारा
उद्भभव, अवसान
प्रेम!
कहां कहां व्याप्त हो तुम
और कहां नहीं
सब करते हैं तुम्हारी बडाईयां
न जाने कितने
जीत, हार चुके तुम्हारे दम
अपनी जीवन लडाईयां
झेल चुके तन्हाईयां, रुस्वाईयां
और
आज भी जारी है अनवरत
न जाने कहां कहां
किस किस रूप में
कितने संग्राम
कत्ल ए आम
प्रेम!
तुम्हें शत शत प्रणाम
कितना छोटा
और आसान है
तुम्हारा नाम
पर
कितनी दुरुह,
दुर्लभ, दुर्गम
तुम्हारी राह
तुम्हारी चाह
अथाह!
जो पाए, बोराए
स्वांग रचाए
रंग में तेरे
रंग रंग जाए.........
तुम केवल प्रेम क्यूं नहीं हो
क्यूं है तुम्हारे साथ
तुम्हारी चाह
तुम्हारी आह
क्यूं बेकल है हर कोई
जानने के लिए
तुम्हारी थाह
ओ प्रेम!
आखिर क्या है
तुम्हारा रूप, स्वरूप
तुम!
मौन
वाचाल
भीतर
बाहर
व्यक्त
अव्यक्त
निज
सार्वजनिक
क्या हो तुम?
क्या है तुम्हारी पहचान
कहां है तुम्हारा
उद्भभव, अवसान
प्रेम!
कहां कहां व्याप्त हो तुम
और कहां नहीं
सब करते हैं तुम्हारी बडाईयां
न जाने कितने
जीत, हार चुके तुम्हारे दम
अपनी जीवन लडाईयां
झेल चुके तन्हाईयां, रुस्वाईयां
और
आज भी जारी है अनवरत
न जाने कहां कहां
किस किस रूप में
कितने संग्राम
कत्ल ए आम
प्रेम!
तुम्हें शत शत प्रणाम
कितना छोटा
और आसान है
तुम्हारा नाम
पर
कितनी दुरुह,
दुर्लभ, दुर्गम
तुम्हारी राह
तुम्हारी चाह
अथाह!
जो पाए, बोराए
स्वांग रचाए
रंग में तेरे
रंग रंग जाए.........
26 June, 2010
एक कविता प्रेम पर
प्रेम
जो भी करता है
उसे अपना ही एक अर्थ देता है
किसी के लिए
राधाष्याम, मीरागिरधर,
सोहनीमहिवाल, हीररांझा,
ढोलामरवण है प्रेम
किसी के लिए
किसी को देखना भर प्रेम है
किसी को
किसी का अच्छा लगना
किसी के लिए
किसी की जान प्रेम है
तो किसी के लिए
किसी के साथ सोने की चाह भर है प्रेम
जितने प्रेम
उतने अर्थ
कुछ अनमोल
कुछ व्यर्थ
किसी के लिए ईष्वर
किसी के लिए भक्ति
किसी के लिए आसक्ति
किसी के लिए विरक्ति है प्रेम
मेरे लिए प्रेम है
एक आष्चर्य
शब्द व्यक्त से परे
एक ऐसा आष्चर्य
जो सिर्फ होता है
होता है
कहीं भी
कभी भी
जो भी करता है
उसे अपना ही एक अर्थ देता है
किसी के लिए
राधाष्याम, मीरागिरधर,
सोहनीमहिवाल, हीररांझा,
ढोलामरवण है प्रेम
किसी के लिए
किसी को देखना भर प्रेम है
किसी को
किसी का अच्छा लगना
किसी के लिए
किसी की जान प्रेम है
तो किसी के लिए
किसी के साथ सोने की चाह भर है प्रेम
जितने प्रेम
उतने अर्थ
कुछ अनमोल
कुछ व्यर्थ
किसी के लिए ईष्वर
किसी के लिए भक्ति
किसी के लिए आसक्ति
किसी के लिए विरक्ति है प्रेम
मेरे लिए प्रेम है
एक आष्चर्य
शब्द व्यक्त से परे
एक ऐसा आष्चर्य
जो सिर्फ होता है
होता है
कहीं भी
कभी भी
भायला(राजस्थानी)
जद उणां सूंप्यो उणनै
मीठै पुरसारै रो धामो
बिचै री सैंग पंगतां डाकनै
वो पूग्यो ठेठ वीं पंगत
जठै उडीकै हा पुरसारै सारू उणरा
खासमखास भायला
भायला आखिर भायला हुवै
भायला नै बिसरायां किंया सरै
आडै वगत भायला ईज काम आवै
वडा वडा जीमणां में
भायला मिल जावै तो राम मिल जावै
भायला साथै जीमणै
अर
भायला नै जीमावणै में
खास आनंद आवै
मीठै पुरसारै रो धामो
बिचै री सैंग पंगतां डाकनै
वो पूग्यो ठेठ वीं पंगत
जठै उडीकै हा पुरसारै सारू उणरा
खासमखास भायला
भायला आखिर भायला हुवै
भायला नै बिसरायां किंया सरै
आडै वगत भायला ईज काम आवै
वडा वडा जीमणां में
भायला मिल जावै तो राम मिल जावै
भायला साथै जीमणै
अर
भायला नै जीमावणै में
खास आनंद आवै
22 June, 2010
पिता
पिता
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने महसूसा
कितना जरूरी था मेरे लिए
तुम्हारा होना
तुम्हारा बिछौना
बात बात पर
रोकना, टोकना
कितना निश्चिंत
मुक्त था मैं
तुम्हारी छाया में
सुप्त था मैं
तुम चिता में चुपचाप
मैं चिंता में चुपचाप
तुम्हारा वह चिर मौन
कितना बोल रहा था
स्म्रतियों के कितने
अनगिन द्वार खोल रहा था
उन कुछ ही पलों में मैं
एक जीवन जी गया
कितनी खुशियां
वह एक आंसू पी गया
पिता!
अब मैं कभी नहीं सुन पाऊंगा
अपनी ही तरह का
मेरे लिए
तुम्हारा वह अलौकिक संबोधन
जिसे सुन
सब पूछ्ते थे
ओह!
यह नाम भी है तुम्हारा
आज सिर्फ़ तुम नहीं गए
चला गया तुम्हारे साथ ही
मेरा वह लाडेसर नाम भी
तुम्हारा झुरना,
मेरा झुरना था
तुम्हारा मरना
मेरा मरना है!!
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने महसूसा
कितना जरूरी था मेरे लिए
तुम्हारा होना
तुम्हारा बिछौना
बात बात पर
रोकना, टोकना
कितना निश्चिंत
मुक्त था मैं
तुम्हारी छाया में
सुप्त था मैं
तुम चिता में चुपचाप
मैं चिंता में चुपचाप
तुम्हारा वह चिर मौन
कितना बोल रहा था
स्म्रतियों के कितने
अनगिन द्वार खोल रहा था
उन कुछ ही पलों में मैं
एक जीवन जी गया
कितनी खुशियां
वह एक आंसू पी गया
पिता!
अब मैं कभी नहीं सुन पाऊंगा
अपनी ही तरह का
मेरे लिए
तुम्हारा वह अलौकिक संबोधन
जिसे सुन
सब पूछ्ते थे
ओह!
यह नाम भी है तुम्हारा
आज सिर्फ़ तुम नहीं गए
चला गया तुम्हारे साथ ही
मेरा वह लाडेसर नाम भी
तुम्हारा झुरना,
मेरा झुरना था
तुम्हारा मरना
मेरा मरना है!!
20 June, 2010
ओ मेरे पिता
ओ मेरे पिता!
मुझे है पता
मैं कभी नहीं उतरा
तुम्हारी अपेक्षाओं पर खरा
कभी नहीं रख सका
तुम्हारी छांह में
खुद को हरा भरा
मैं कभी नहीं भूला पाता
हमेशा संदेहों से घिरा
तुम्हारा वह चेहरा!
ओ पिता!
मुझे बता!
मैं कितना रीता
कितना बीता
तुम्हें तो सब है पता
तुम हो पिता!
मुझे है पता
मैं कभी नहीं उतरा
तुम्हारी अपेक्षाओं पर खरा
कभी नहीं रख सका
तुम्हारी छांह में
खुद को हरा भरा
मैं कभी नहीं भूला पाता
हमेशा संदेहों से घिरा
तुम्हारा वह चेहरा!
ओ पिता!
मुझे बता!
मैं कितना रीता
कितना बीता
तुम्हें तो सब है पता
तुम हो पिता!
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