सफ़ेदी की चमकार
ये अंदर की बात है
टेस्ट आफ़ इंडिया
कुछ मीठा हो जाए
हटके झटके
टेढे हैं पर मेढे हैं
भूख लगे तो बस...
क्या करें मानते ही नहीं बच्चे
कितने ही शैंपू काम लिए
बालों को लम्बे काले घने रखने के लिए
फ़िर कोई नया शैंपू आ धमकता है
एक नयी खासियत के साथ
कितने फ़ेसवाश काम लिए
चेहरे को खूबसूरत और हसीन बनाने के लिए
फ़िर कोई फ़ेसवाश आ धमकता है
एक नयी खासियत के साथ
कितनी साबुनें आजमायी
देह की ताज़गी के लिए
फ़िर कोई नई साबुन आ जाती है
ललचाने के लिए
कितने शक्तिवर्धक प्राश, कैप्सूल लिए
योग व्यायाम किए
इस काया को चुस्त दुरस्त दीर्घायु रखने के लिए
फ़िर कोई नया नुस्खा आ जाता है
भरमाने के लिए
खाने पीने, जगने सोने से लेकर
जीवन का हर क्रिया कलाप
संचालित है विग्यापनों के हाथों
केवल बच्चे ही नहीं
हम सब जीते हैं
विघ्यापित जीवन
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14 June, 2010
12 June, 2010
अच्छे दिन
और अच्छे दिनों की
चाह,उम्मीद में
यूं ही चले जाते हैं
जाने कितने अच्छे दिन
हम देखते भर रह जाते हैं
गुजर जाते हर अच्छे दिन को
क्या होता है अच्छे से और अच्छा
कब किसने सोचा!
क्या हो गया है हमारे ज़ेहन को
क्यूं कोसते रहते हैं हमेशा
अपने वर्तमान को
बन बैठते हैं खुद ही,
खुद के भविष्यवक्ता
चाह,उम्मीद में
यूं ही चले जाते हैं
जाने कितने अच्छे दिन
हम देखते भर रह जाते हैं
गुजर जाते हर अच्छे दिन को
क्या होता है अच्छे से और अच्छा
कब किसने सोचा!
क्या हो गया है हमारे ज़ेहन को
क्यूं कोसते रहते हैं हमेशा
अपने वर्तमान को
बन बैठते हैं खुद ही,
खुद के भविष्यवक्ता
05 June, 2010
अभिमन्यु
और कितने झूठ
और कितने बहाने
और कितने समर्पण
सहने होंगे
आखिर कब तक
होंठ गूंगे, आंखें अंधी,
कान बहरे होंगे
किसके
भीतर की धधकती आग
बनेगी सबके हकों की मशाल
मनुष्यता का भख लेती
दानवी ताकतों के विरुद्ध
राजनीति, अपने हितों से ऊपर उठकर
कौन हूंकारेगा, लडे.गा?
अपना पहला पग धरेगा
निनाद, जयघोष करेगा
भेदेगा चक्रव्यूह,
बनेगा अभिमन्यु
बचेगा और बचाएगा हमें!!
और कितने बहाने
और कितने समर्पण
सहने होंगे
आखिर कब तक
होंठ गूंगे, आंखें अंधी,
कान बहरे होंगे
किसके
भीतर की धधकती आग
बनेगी सबके हकों की मशाल
मनुष्यता का भख लेती
दानवी ताकतों के विरुद्ध
राजनीति, अपने हितों से ऊपर उठकर
कौन हूंकारेगा, लडे.गा?
अपना पहला पग धरेगा
निनाद, जयघोष करेगा
भेदेगा चक्रव्यूह,
बनेगा अभिमन्यु
बचेगा और बचाएगा हमें!!
15 May, 2010
बचपन
’बोई कट लम्बा है!
की गूंज के साथ
टेढी मेढी गलियों में,
आसमान में कटकर लहराती पतंग को
लूटने की होड में
अर्जुन की आंख मांनिद टक टक आंखे
ऊंची नीची छ्तों को लांघते
बेखौफ़ नन्हे नंगे पांव
कंटीले झाड की वो लम्बी टहनी थामे
कुछ नन्हे हाथ
आज भी है जस तस
स्म्रति पटल पर!
पर नहीं है आज
पतंगों भरा वो आसमान
’बोई कट लम्बा है!’ का गुंजान गान
सच! हमारे साथ साथ
कितना बडा कर दिया है हमने
हमारे बच्चों का बचपन
की गूंज के साथ
टेढी मेढी गलियों में,
आसमान में कटकर लहराती पतंग को
लूटने की होड में
अर्जुन की आंख मांनिद टक टक आंखे
ऊंची नीची छ्तों को लांघते
बेखौफ़ नन्हे नंगे पांव
कंटीले झाड की वो लम्बी टहनी थामे
कुछ नन्हे हाथ
आज भी है जस तस
स्म्रति पटल पर!
पर नहीं है आज
पतंगों भरा वो आसमान
’बोई कट लम्बा है!’ का गुंजान गान
सच! हमारे साथ साथ
कितना बडा कर दिया है हमने
हमारे बच्चों का बचपन
09 May, 2010
मां!
बचपन की जरूरत
ममता की मूरत है मां
धरती पर साक्षात
ईश्वर की सूरत है मां
स्नेह का आंचल
नज़र का टीका है मां
ग्यान की पहली अंगुली
जीवन का सलीका है मां
मां मीत मां प्रीत है
मां गीत है, संगीत है
मां को प्रणाम नमन
मां से ही है जीव और जीवन
ममता की मूरत है मां
धरती पर साक्षात
ईश्वर की सूरत है मां
स्नेह का आंचल
नज़र का टीका है मां
ग्यान की पहली अंगुली
जीवन का सलीका है मां
मां मीत मां प्रीत है
मां गीत है, संगीत है
मां को प्रणाम नमन
मां से ही है जीव और जीवन
मां!
मां!
तुमने बताया था मुझे
मेरी तुतलाती ज़ुबान से
निकला पहला शब्द
जिसे सुनते ही
भर लिया था तुमने अपने आंचल में
और चूम लिया था मेरा ललाट
वह अहसास तब भी अव्यक्त था
और आज भी
ठीक वैसे ही जैसे कि तुम! अव्यक्त
मैंने हमेशा ही कही तुम्हें अपने मन की
बिना जाने तुम्हारा मन
मैं कभी नहीं भूलता
मेरे सुख-खुशी पर तुम्हारे चेहरे की
वह चिर पावन मुस्कान
मेरे सर वह नेह भरा कोमल स्पर्श
मैंने कभी कुछ नहीं छिपाया अपना
तुमने कभी कुछ बताया अपना
तुम्हारा एक उम्र सा मौन
आज कितना बोलता है!!
मैं तुम्हें हमेशा सुनता हूं मां!
-नवनीत पाण्डे
तुमने बताया था मुझे
मेरी तुतलाती ज़ुबान से
निकला पहला शब्द
जिसे सुनते ही
भर लिया था तुमने अपने आंचल में
और चूम लिया था मेरा ललाट
वह अहसास तब भी अव्यक्त था
और आज भी
ठीक वैसे ही जैसे कि तुम! अव्यक्त
मैंने हमेशा ही कही तुम्हें अपने मन की
बिना जाने तुम्हारा मन
मैं कभी नहीं भूलता
मेरे सुख-खुशी पर तुम्हारे चेहरे की
वह चिर पावन मुस्कान
मेरे सर वह नेह भरा कोमल स्पर्श
मैंने कभी कुछ नहीं छिपाया अपना
तुमने कभी कुछ बताया अपना
तुम्हारा एक उम्र सा मौन
आज कितना बोलता है!!
मैं तुम्हें हमेशा सुनता हूं मां!
-नवनीत पाण्डे
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